बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में हुई रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग ने राज्य की राजनीति में नए समीकरण बना दिए हैं। लंबे समय से कायम जातीय गोलबंदियों की दीवारों में अब दरारें दिख रही हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि महिलाएं इस बार निर्णायक भूमिका में यानी किंगमेकर बनकर उभरी हैं।
मतदान प्रतिशत में आई बढ़ोतरी ने यह साबित किया कि जनता अब केवल नारे नहीं, बल्कि परिणाम और भरोसे के आधार पर वोट दे रही है। चुनाव आयोग के अनुसार, मतदाता सूची की शुद्धता और तकनीकी सुधारों ने इस बार वोटिंग को ज्यादा सटीक और पारदर्शी बनाया। करीब 35 से 65 लाख फर्जी और मृत नामों को हटाए जाने के बाद पहली बार वोट देने वाले युवा और ग्रामीण महिलाएं बड़े पैमाने पर शामिल हुईं।
गांवों में सुबह से शाम तक बूथों पर लगी लंबी कतारों ने यह संदेश दिया कि बिहार अब बदल रहा है। कई इलाकों में महिलाओं ने पुरुषों से 5-7 प्रतिशत ज्यादा मतदान किया, जो नई राजनीतिक चेतना का प्रमाण है। स्वयं सहायता समूहों, 35% आरक्षण और सरकारी योजनाओं ने महिलाओं को आत्मविश्वास दिया है।
राजनीतिक रूप से, तेजस्वी यादव की माई-बहन-मान योजना और एनडीए का विकास एवं सुरक्षा एजेंडा सीधे महिलाओं और युवाओं को प्रभावित कर रहा है। वहीं जातीय समीकरणों में भी उलटफेर देखने को मिला—राघोपुर, मोकामा और कई यादव-भूमिहार क्षेत्रों में पारंपरिक वोट पैटर्न टूटा है।
दूसरे चरण में सीमांचल और कोसी का मुस्लिम बहुल इलाका चुनौतीपूर्ण होगा, जहां धार्मिक और विकासात्मक मुद्दों की जंग तेज हो गई है।
कुल मिलाकर, पहला चरण एक राजनीतिक संकेत है, जहां महिलाएं और युवा अब सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि बिहार की सियासत के असली पटकथा लेखक बन गए हैं। जाति का मिथक दरक चुका है, अब भरोसे और विकास का नया गणित बन रहा है।
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