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Saturday, October 17, 2026
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विदेश जाने वालों से एफिडेविट लें, राज्यसभा में भाजपा सांसद ने दिया सुझाव! 

राज्यसभा में बताया गया कि हाल ही में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां विदेश में रह रहे युवाओं ने बुजुर्ग माता-पिता के स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखा।

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राज्यसभा में बुधवार को एक बेहद मानवीय विषय रखा गया। इसके तहत सुझाव दिया गया कि विदेश जाने वाले लोगों से एफिडेविट लिए जाएं। इस एफिडेविट के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाए कि विदेश जाने वाले युवा अपने माता-पिता की देखभाल करेंगे और उनसे नियमित संपर्क बनाए रखेंगे।

राज्यसभा में बताया गया कि हाल ही में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां विदेश में रह रहे युवाओं ने बुजुर्ग माता-पिता के स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखा। यहां तक कि भारत में रह रहे माता-पिता की मृत्यु होने पर भी वे नहीं आए। भाजपा सांसद राधा मोहनदास अग्रवाल ने राज्यसभा में यह विषय रखा।

उन्होंने विदेश में रहने वाले बच्चों के माता-पिता की सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए बताया कि देश के करीब साढ़े तीन करोड़ लोग विदेशों में रहते हैं और उन लोगों में से बड़ी संख्या है, जिनके माता-पिता भारत में हैं। कई बार माता-पिता अपनी जमीन-जायदाद बेचकर, सुख त्यागकर अपने बच्चों को विदेश पढ़ने या नौकरी करने भेजते हैं।

राधा मोहनदास अग्रवाल ने सदन को बताया कि कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां विदेश में रहने वाले बच्चों ने अपने माता-पिता की देखभाल नहीं की। उन्होंने इंदौर और दिल्ली की घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि कुछ माता-पिता की मृत्यु के बाद भी उनके बच्चे वापस नहीं आए, जिससे उनका अंतिम समय अकेलेपन में बीता। सरकारी कानून, जैसे मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन एक्ट, 2007, अभी भी पूरी तरह प्रभावी नहीं है।

उन्होंने राज्यसभा में सुझाव दिया कि विदेश जाने वाले लोगों से एफिडेविट लिया जाए, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि वे अपने माता-पिता की देखभाल करेंगे, हेल्थ इंश्योरेंस करेंगे और नियमित संपर्क बनाए रखेंगे। भाजपा सांसद ने यह भी कहा कि अगर ऐसा प्रमाण हर छह महीने में नहीं मिलता, तो भारत सरकार को उनके पासपोर्ट निरस्त करने और उन्हें वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए।

अग्रवाल ने सदन से आग्रह किया कि इस मुद्दे को गंभीरता से देखा जाए ताकि देश के वरिष्ठ नागरिकों को अकेलेपन और अनदेखी का सामना न करना पड़े। जो लोग विदेशों में जाकर रहते हैं, उनके मां-बाप, सास-ससुर भारत में रहते हैं।

उन्होंने बताया कि ये लोग जो बाहर विदेशों में पढ़ने गए या नौकरियां कर रहे हैं, ऐसा नहीं है कि वो सिर्फ अपनी योग्यता के आधार पर गए हैं। मां-बाप अपना पेट काटकर, अपना सुख त्याग करके और कभी-कभी विदेश भेजने के लिए अपनी जमीन-जायजाद बेचकर उनके विदेश जाने की व्यवस्था करते हैं। वो इतने शिक्षित हुए हैं। इसमें कई बार सरकार द्वारा दी जाने वाली सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था का भी योगदान होता है।
शुरू-शुरू में जब ये विदेश जाते हैं तो मां-बाप की चिंता करते हैं। उनके बच्चे होते हैं तो मां-बाप को या सास-ससुर को बुला लेते हैं क्योंकि वहां देखरेख करने वाले लोग बड़े महंगे मिलते हैं।

भाजपा सांसद राधा मोहनदास अग्रवाल ने कहा कि समय बीतता है और धीरे-धीरे उनका लगाव अपने मां-बाप के प्रति घटता चला जाता है। मैं आपको इंदौर की एक घटना बताऊंगा। कुछ दिन पहले एक ऐसे व्यक्ति के पिता की मौत हो गई और 20 दिन बाद उसकी मां की मौत हो गई।

दोनों मां-बाप का शरीर सड़ता गया, गलता गया, पर उनके बच्चे कभी लौटकर उनके पास नहीं आए। दिल्ली में भी ऐसी ही घटनाएं हुई हैं। आंकड़े बताते हैं कि ऐसी करीब 500 घटनाएं देश में हुई हैं, जहां लोगों के बच्चे विदेश में हैं। लेकिन अंतिम काल में भी वे नहीं आए। ऐसे बुजुर्गों के जीवन का सारा सुख चला जाता है और पीड़ांतक मौत उनको अकेलेपन में प्राप्त होती है।

उन्होंने कहा कि मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन एक्ट करीब-करीब एक दन्तहीन एक्ट था। मां-बाप अगर कोर्ट में जाकर कहेंगे तब उनको सुविधा मिलेगी।

उन्होंने कहा कि वह सभापति के माध्यम से विदेश मंत्री से आग्रह करेंगे कि जो लोग विदेश जाते हैं, उनसे एक एफिडेविट लिया जाए कि वे विदेश जाने के बाद अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा मां-बाप की देखभाल के लिए अवश्य दें। मां-बाप की देखभाल के लिए केयरटेकर की नियुक्ति करें। मां-बाप के हेल्थ इंश्योरेंस का प्रावधान करें और कम से कम हफ्ते में एक बार अपने मां-बाप से फोन पर बात जरूर करें।

उन्होंने कहा कि यह भी प्रावधान किया जाना चाहिए कि हर 6 महीने में एक सर्टिफिकेट लिया जाए, सर्टिफिकेट ऑफ फुलफिल्ड ऑब्लिगेशन और लोग इस प्रकार के ऑब्लिगेशन सर्टिफिकेट्स नहीं देते हैं तो भारत सरकार को ऐसे लोगों का पासपोर्ट निरस्त करना चाहिए और उन्हें वापस भारत में बुला लेना चाहिए।

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