केरल की नीलांबुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की जीत ने सत्तारूढ़ एलडीएफ के खिलाफ विपक्ष को नई ऊर्जा दे दी है। इस जीत को न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए एक संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।
नीलांबुर सीट से यूडीएफ उम्मीदवार आर्यदान शौकत ने सीपीआई-एम के एम स्वराज को करीब 11,000 वोटों के अंतर से हराया। शौकत पूर्व मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता आर्यदान मुहम्मद के बेटे हैं। इस जीत में सीपीआई-एम से अलग हुए पीवी अनवर की भूमिका भी अहम मानी जा रही है, जिन्हें बतौर निर्दलीय लगभग 20,000 वोट मिले और इस तरह उन्होंने एलडीएफ की संभावनाओं को अप्रत्यक्ष रूप से कमजोर किया।
कांग्रेस नेताओं ने उपचुनाव में जीत का श्रेय यूडीएफ के आक्रामक अभियान और प्रियंका गांधी के दो दिवसीय प्रचार को दिया। कांग्रेस के एआईसीसी सचिव मंसूर खान ने कहा, “प्रियंका गांधी का प्रचार एक अतिरिक्त लाभ रहा। यूडीएफ ने यहां पहले मामूली अंतर से चुनाव हारा था, लेकिन इस बार हमने मजबूत वापसी की है।”
एआईसीसी के केरल प्रभारी पीवी मोहन ने कहा, “यह हार मुख्यमंत्री के लिए एक सीधा झटका है। जनता एलडीएफ की नीतियों से तंग आ चुकी है। एलडीएफ अब आरएसएस की मदद से चुनाव जीतने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसमें सफल नहीं हो पाया है।”
पूर्व सीपीआई-एम नेता पीवी अनवर, जिन्होंने एलडीएफ छोड़ने के बाद टीएमसी में शामिल होने की कोशिश की थी लेकिन तकनीकी आधार पर चुनाव आयोग ने उनका नामांकन खारिज कर दिया उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति मिली। उन्होंने निर्दलीय के रूप में मैदान में उतर कर एलडीएफ के वोट बैंक को प्रभावित किया और यूडीएफ की जीत में परोक्ष भूमिका निभाई। भाजपा ने मोहन जॉर्ज को मैदान में उतारा था, लेकिन उन्हें केवल 6,000 वोट मिले। इस चुनाव में भाजपा की भूमिका केवल समीकरणों को परखने तक सीमित रही।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत यूडीएफ के लिए 2026 विधानसभा चुनावों से पहले सत्ता विरोधी लहर का प्रमाण है। कांग्रेस इसे राज्य में अपनी वापसी की शुरुआत के तौर पर देख रही है। नीलांबुर उपचुनाव परिणाम से कांग्रेस और यूडीएफ को स्पष्ट बढ़त मिली है, और यह संकेत देता है कि केरल की राजनीति में आने वाले वर्षों में बदलाव की संभावनाएं प्रबल हैं। एलडीएफ के लिए यह चुनाव एक चेतावनी की तरह है, जबकि कांग्रेस इसे अगले बड़े चुनावों के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त के रूप में देख रही है।
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