कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें तेज हैं, लेकिन डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार अब भी एक संतुलित और रहस्यमय रुख अपनाए हुए हैं। उन्होंने न तो मुख्यमंत्री पद की अपनी इच्छा को साफ तौर पर जाहिर किया है और न ही उसे पूरी तरह खारिज किया है। उनकी हर टिप्पणी राजनीतिक संकेतों से भरी दिख रही है — कभी पार्टी के प्रति पूरी निष्ठा, तो कभी निजी महत्वाकांक्षा की झलक।
शुक्रवार(4 जुलाई) को संवाददाताओं से बात करते हुए शिवकुमार ने कहा, “चाहे प्रयास असफल हो जाएं, प्रार्थनाएं व्यर्थ नहीं जातीं। मैंने जो चाहा है, उसके लिए प्रार्थना की है। यह राजनीतिक चर्चा का स्थान नहीं है, राज्य के लिए शुभ हो यही कामना है।” इस कथन ने न सिर्फ उनकी मंशा को और रहस्यमय बना दिया, बल्कि नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा को और हवा दी।
हाल ही में जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से जून 30 को इस मुद्दे पर सवाल किया गया, तो उन्होंने भी यह कहकर अटकलों को विराम नहीं दिया कि “यह हाईकमान का विषय है। किसी को नहीं मालूम कि हाईकमान में क्या चल रहा है।” खड़गे के इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी।
1 जुलाई को शिवकुमार ने इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में कहा था कि “मुझे मुख्यमंत्री बनने की कोई इच्छा नहीं है, मेरा लक्ष्य 2028 के चुनाव में कांग्रेस को मजबूत करना है।” लेकिन अगले ही दिन यानी 2 जुलाई को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया द्वारा यह कहे जाने पर कि वे पूरा कार्यकाल पूरा करेंगे, शिवकुमार ने कहा, “मेरे पास क्या विकल्प है, मुझे उनका समर्थन करना ही होगा। जो हाईकमान कहेगा, वही करूंगा।”
हालांकि कांग्रेस के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला यह स्पष्ट कर चुके हैं कि नेतृत्व परिवर्तन का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है, लेकिन शिवकुमार की बार-बार बदलती भाषा यह संकेत देती है कि वह अभी भी शीर्ष पद की ओर नजरें गड़ाए बैठे हैं।
यह रणनीति टकराव से बचने की है, लेकिन साथ ही वह पार्टी हाईकमान और जनता को यह याद भी दिला रहे हैं कि उनकी महत्वाकांक्षा अभी भी जीवित है। कर्नाटक की राजनीति में आने वाले दिनों में इस रहस्यमय चुप्पी के कई मायने निकल सकते हैं।
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