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Sunday, May 3, 2026
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पुलिस विभाग के सारे तुग़लकी आदेश दे रहें असंवैधानिक महानिदेशक !

बाबूलाल मरांडी के आरोप

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झारखंड पुलिस महानिदेशक (DGP) अनुराग गुप्ता को सेवा विस्तार दिये बिना पद पर बरकरार रखने को लेकर राज्य की राजनीति एक बार फिर उबल उठी है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि गुप्ता “असंवैधानिक तरीके से इस पद पर काम करते हुए तुगलकी आदेश दे रहे हैं” और मुख्यमंत्री अपनी ही “गलती” के आगे “बेबस” हो गये हैं।

मरांडी के मुताबिक, अखिल भारतीय सेवा नियमावली के मुताबिक अनुराग गुप्ता 30 अप्रैल 2025 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं। न उन्हें विधिवत सेवा‑विस्तार मिला, न संविदा नियुक्ति की अधिसूचना जारी हुई, फिर भी वे डीजीपी की कुर्सी पर बैठे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “पुलिस विभाग के सारे तुगलकी आदेश अनुराग गुप्ता ही दे रहे हैं। सिपाहियों तक की ट्रांसफर‑पोस्टिंग कैसे ले‑देकर हो रही है? पता कर लीजिए।”

मरांडी ने दावा किया कि 10 जून को गुप्ता ने आठ आईपीएस अफ़सरों को अतिरिक्त दायित्व सौंपते हुए आदेश जारी कर दिया, वह भी बिना मुख्यमंत्री की स्वीकृति के। गृह विभाग ने आदेश रद्द कर गुप्ता से ‘स्पष्टीकरण’ मांगा है। इस पर मरांडी ने सवाल उठाया, “आप स्पष्टीकरण किससे मांग रहे हैं? उस व्यक्ति से जिसे आप नियमों के दायरे में ला ही नहीं सकते?”

भाजपा नेता का तर्क है कि सेवा निवृत्ति के बाद गुप्ता अब अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी ही नहीं, लिहाजा उन पर न निलंबन लागू होता है, न विभागीय कार्रवाई; वेतन भी बंद है। ऐसे में गृह विभाग के नोटिस का कोई औचित्य नहीं बचता। मरांडी ने सीएम पर तंज कसते हुए लिखा,“आपकी चुप्पी और बेबसी क्या दर्शाती है? या तो आपको पता नहीं, या आप पूरी तरह अयोग्य हैं… झारखंड के कुछ बेलगाम अफ़सर अब संविधान से नहीं, सत्ता के साथ ‘नेटवर्क’ से चलते हैं।”

सरकारी हलकों से अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। हालांकि उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि डीजीपी पद से हटाने या संविदा पर नई अधिसूचना का फैसला जल्द लिया जा सकता है। इधर, राज्य पुलिस मुख्यालय ने भी आदेश रद्द होने और वेतन अवरुद्ध रहने पर कोई नया आधारपत्र जारी नहीं किया है।

झारखंड में वर्ष 2024‑25 के चुनावी मौसम से पहले यह मुद्दा सरकार के लिए सियासी सिरदर्द बनता दिख रहा है। भाजपा इसे व्यवस्थागत अराजकता का उदाहरण बताकर जनता के बीच ले जाने की तैयारी कर रही है, जबकि सत्तारूढ़ झामुमो‑कांग्रेस गठबंधन फिलहाल डैमेज कंट्रोल में जुटा है।

फिलहाल झारखंड सरकार के गृह विभाग की ओर से डीजीपी अनुराग गुप्ता की नियुक्ति को लेकर जांच जारी है और उसकी रिपोर्ट का सभी को इंतजार है।  यदि रिपोर्ट में नियुक्ति प्रक्रिया में गड़बड़ी सामने आती है तो इस मामले को लेकर अदालत में कानूनी चुनौती भी दी जा सकती है, क्योंकि मामला अखिल भारतीय सेवा नियमावली के उल्लंघन और संवैधानिक मर्यादा से जुड़ा है।

फिलहाल, राज्य की शीर्ष पुलिस कुर्सी पर बैठे अधिकारी की संवैधानिक वैधता और शासन की जवाबदेही, दोनों प्रश्नों के घेरे में हैं। जवाब चाहे जो भी मिले, झारखंड की प्रशासनिक पारदर्शिता पर उठी यह बहस और गहराने वाली है।

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