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Sunday, June 28, 2026
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‘कृष्णा’ कोई विवाद नहीं, जीवनदायिनी नदी का नाम हैः एनसीईआरटी!

दरअसल, कुछ रिपोर्टों में कन्नड़ पाठ्यपुस्तक ‘कृष्णा’ के नाम और उसमें शामिल भोजन संबंधी सामग्री को लेकर सवाल उठाए गए थे।

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कक्षा 6 की कन्नड़ आर-3 पाठ्यपुस्तक को लेकर हाल के दिनों में उठे विवाद और सवालों पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने विस्तार से अपना पक्ष रखा है। परिषद ने स्पष्ट किया है कि पुस्तक के नाम से लेकर उसके भोजन संबंधी अध्याय तक, हर विषय को शैक्षणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से सावधानीपूर्वक तैयार किया गया है। दरअसल, कुछ रिपोर्टों में कन्नड़ पाठ्यपुस्तक ‘कृष्णा’ के नाम और उसमें शामिल भोजन संबंधी सामग्री को लेकर सवाल उठाए गए थे।

इन चर्चाओं के बीच एनसीईआरटी ने स्पष्ट किया कि पुस्तक का नाम किसी विचारधारा, धार्मिक संदर्भ या विशेष संदेश से नहीं जुड़ा है, बल्कि यह भारत की महान नदियों के नाम पर पाठ्यपुस्तकों का नामकरण करने की परंपरा का हिस्सा है।

परिषद ने बताया कि हिंदी की पुस्तक ‘गंगा’, अंग्रेजी की ‘कावेरी’, उर्दू की ‘जमुना’ और कन्नड़ की ‘कृष्णा’ नाम से प्रकाशित की गई है। कर्नाटक की पहचान और सांस्कृतिक विरासत से गहराई से जुड़ी कृष्णा नदी के नाम को अपनाना स्थानीय संदर्भों को शिक्षा से जोड़ने की दिशा में एक स्वाभाविक कदम है।

एनसीईआरटी के अनुसार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 में शिक्षा को स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और विद्यार्थियों के जीवन से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है। इसी सोच के तहत भाषा पुस्तकों को नदियों के नाम दिए गए हैं, ताकि विद्यार्थियों में अपने क्षेत्र और देश की सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जुड़ाव विकसित हो सके। पाठ्यपुस्तक के एक अध्याय को लेकर यह दावा किया जा रहा था कि उसमें किसी विशेष प्रकार के भोजन को बढ़ावा दिया गया है।

हालांकि, एनसीईआरटी ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा कि अध्याय ‘स्वास्थ्य ही धन है’ का मुख्य उद्देश्य केवल स्वस्थ जीवनशैली और संतुलित आहार के महत्व को समझाना है। अध्याय में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और स्वच्छता तीनों आवश्यक हैं। विद्यार्थियों को यह भी समझाया गया है कि दूध, फल, हरी पत्तेदार सब्जियां, अन्य सब्जियां और विभिन्न पौष्टिक खाद्य पदार्थ शरीर की जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि पुस्तक में दिए गए चित्रों में केवल शाकाहारी ही नहीं, बल्कि मांसाहारी खाद्य पदार्थों को भी स्थान दिया गया है। यानी भोजन को किसी एक दायरे में सीमित नहीं किया गया, बल्कि संतुलित और पोषणयुक्त आहार की व्यापक अवधारणा प्रस्तुत की गई है।

अध्याय में देश के विभिन्न राज्यों के पारंपरिक और स्वास्थ्यवर्धक व्यंजनों का उल्लेख भी किया गया है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को यह बताना है कि भारत की खाद्य संस्कृति बेहद विविध और समृद्ध है, और स्वस्थ भोजन के कई रूप हो सकते हैं।

एनसीईआरटी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पुस्तक में कहीं भी शाकाहार को श्रेष्ठ साबित करने या मांसाहार का विरोध करने का प्रयास नहीं किया गया है। पूरा अध्याय केवल स्वास्थ्य जागरूकता और संतुलित आहार की समझ विकसित करने पर केंद्रित है।

परिषद ने कहा है कि वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सामग्री उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है और पाठ्यपुस्तकों को बेहतर बनाने के लिए शिक्षकों, अभिभावकों, विशेषज्ञों और समाज के अन्य वर्गों से मिलने वाले सुझावों तथा रचनात्मक आलोचनाओं का हमेशा स्वागत करती है।

विवाद पर एनसीईआरटी का कहना है कि पुस्तक का उद्देश्य विद्यार्थियों को स्थानीय संस्कृति से जोड़ते हुए स्वास्थ्य, पोषण और भारतीय विविधता की समझ विकसित करना है, न कि किसी विशेष विचार या खान-पान की पद्धति का समर्थन करना।

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