गौरतलब है कि यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब अक्टूबर में वित्तीय कार्रवाई कार्यबल यानी एफएटीएफ की पूर्ण बैठक होने वाली है। पाकिस्तान पर पहले भी आतंकवाद के वित्तपोषण और सीमा पार आतंकवाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठते रहे हैं।
पाकिस्तान वर्ष 2021 से यह कहता रहा है कि मसूद अजहर उसके देश में नहीं है और अफगानिस्तान भाग चुका है। उसी साल एफआईए ने उसके सिर पर 50 लाख पाकिस्तानी रुपए का इनाम घोषित किया था। अब पांच साल बाद इस इनाम को बढ़ाकर 70 लाख रुपए कर दिया गया है। हालांकि, भारतीय खुफिया एजेंसियों के पिछले छह महीनों के तकनीकी विश्लेषण के मुताबिक मसूद अजहर पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है।
एफआईए की नई रेड बुक में 26-11 मुंबई आतंकी हमले से जुड़े 19 आतंकियों के नाम भी शामिल हैं। ये वे लोग हैं, जिन्होंने हमले के लिए आतंकियों को समुद्री रास्ते से मुंबई पहुंचाने में मदद की, उन्हें आर्थिक सहायता दी या अभियान के प्रबंधन में भूमिका निभाई। इनमें से 17 आतंकियों के नाम के साथ उनकी तस्वीर और 26-11 हमले में उनकी भूमिका का विवरण दिया गया है। लेकिन दो मामलों में पाकिस्तान ने अहम जानकारियां हटा दी हैं।
मुहम्मद खान और अब्दुल रहमान के नाम तो सूची में रखे गए हैं, लेकिन उनकी तस्वीरें, लश्कर-ए-तैयबा से संबंध और हमले में उनकी भूमिका से जुड़ी जानकारी हटा दी गई है। जबकि वर्ष 2021 की एफआईए सूची में दोनों की तस्वीर और पूरी भूमिका दर्ज थी।
मोहम्मद जिया ने 80 हजार रुपए, मोहम्मद अब्बास नासिर ने 2 लाख 53 हजार रुपए, जावेद इकबाल ने 1 लाख 86 हजार 430 रुपए और मुख्तार अहमद ने 2 लाख 98 हजार 47 रुपए दिए थे। अहमद सईद पर अभियान के लिए 21 लाख रुपए देने का आरोप है।
पाकिस्तान की रेड बुक में शामिल मोस्ट वांटेड आतंकियों की संख्या में भी पिछले पांच वर्षों में बड़ा इजाफा हुआ है। वर्ष 2021 में यह संख्या 1,330 थी, जो अब बढ़कर 1,804 हो गई है। यानी इस दौरान करीब 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। आतंकियों को लेकर पाकिस्तान की नई सूची कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि आतंकियों के नाम सूची में डालना तभी प्रभावी कार्रवाई मानी जाएगी, जब उनके खिलाफ वास्तविक जांच, गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई भी हो। केवल इनाम घोषित करने और नाम मोस्ट वांटेड सूची में जोड़ने से आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की प्रतिबद्धता साबित नहीं होती।



