रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस परियोजना में बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली भी शामिल होगी। यह परियोजना लगभग 850 एकड़ खाली रक्षा भूमि पर विकसित की जाएगी। यह परियोजना रक्षा प्रतिष्ठानों को स्वच्छ और विश्वसनीय बिजली उपलब्ध कराने के साथ-साथ पारंपरिक ग्रिड बिजली पर निर्भरता भी कम करेगी। इससे रक्षा क्षेत्र की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और लंबे समय में सरकारी खर्च में भी उल्लेखनीय बचत होने की उम्मीद है।
रक्षा मंत्रालय की इस पहल का उद्देश्य खाली पड़ी रक्षा भूमि का सर्वोत्तम उपयोग करना भी है। परियोजना के माध्यम से न केवल नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को भी मजबूती मिलेगी।
मंगलवार को इस विषय में जानकारी देते हुए रक्षा मंत्रालय ने बताया कि परियोजना का विकास राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) द्वारा प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया के माध्यम से किया जाएगा। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि रक्षा प्रतिष्ठानों के लिए सबसे किफायती दर पर बिजली उपलब्ध कराई जा सके। इस दौरान रक्षा मंत्रालय, सेना मुख्यालय और रक्षा संपदा महानिदेशालय के बीच घनिष्ठ समन्वय सुनिश्चित किया जाएगा।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी नवाचार और पर्यावरणीय स्थिरता का अनूठा संगम है। इससे रक्षा बलों को दीर्घकालिक ऊर्जा उपलब्धता सुनिश्चित होगी, वहीं सरकारी खजाने पर बिजली खरीद का बोझ भी कम होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल रक्षा मंत्रालय की हरित ऊर्जा रणनीति को नई गति देने के साथ-साथ आत्मनिर्भर और ऊर्जा-सुरक्षित भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी।
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