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Thursday, October 1, 2026
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यूपीआई एमडीआर विवाद पर शिवसेना यूबीटी का केंद्र पर हमला!

घरेलू नीति में आए बदलाव को विदेश संबंधों से जोड़ते हुए ठाकरे गुट ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार अमेरिकी दबाव के आगे झुक गए हैं।

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शिवसेना (यूबीटी) ने शनिवार को चुनिंदा यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला किया और आरोप लगाया कि इस कदम से अंततः उपभोक्ताओं पर बोझ पड़ेगा और वैश्विक भुगतान कंपनियों को फायदा होगा।

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी ने अपने मुखपत्र सामना में प्रकाशित एक संपादकीय में 2,000 रुपए से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने को “शब्दों का हेरफेर” बताया और सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह शुल्क केवल व्यापारियों पर लागू होता है, सीधे उपभोक्ताओं पर नहीं।

संपादकीय में बताया गया कि ईंधन पर लगने वाले उत्पाद शुल्क और जीएसटी की तरह, व्यापारी अंततः इन लागतों का बोझ आम ग्राहकों पर ही डालेंगे। इसमें आरोप लगाया गया कि भारतीय डिजिटल लेनदेन बुनियादी ढांचा वीजा और मास्टरकार्ड जैसी वैश्विक अमेरिकी वित्तीय कंपनियों को सौंपा जा रहा है।

इसमें लेनदेन शुल्क को भारत के मध्यम वर्ग और खुदरा व्यापारियों की कीमत पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए दिया जाने वाला एक अप्रत्यक्ष “उपहार” या जबरन वसूली करार दिया गया।

घरेलू नीति में आए बदलाव को विदेश संबंधों से जोड़ते हुए ठाकरे गुट ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार अमेरिकी दबाव के आगे झुक गए हैं। उन्होंने ईरान से तेल की खरीद रोकना, अमेरिकी व्यापार शुल्कों का सामना करना और ट्रंप प्रशासन की राजनयिक मांगों को मानना जैसे उदाहरण पेश किए, जो विदेश नीति में समझौते के सबूत हैं।

संपादकीय में कहा, “यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने का निर्णय केवल अमेरिकी फिनटेक कंपनियों को खुश करने के लिए लिया गया था। इस बात की जांच होनी चाहिए कि भारतीय नेता और उनके बच्चे इन कंपनियों से रोजाना हजारों करोड़ रुपए की दलाली प्राप्त करते हैं।

इसका मतलब यह है कि भारतीय दलालों को भी अमेरिका से प्राप्त होने वाली इस जबरन वसूली में हिस्सा लेना पड़ता है। यही राष्ट्रीय सेवा का नया रूप है! इसके लिए देश के आम नागरिकों और छोटे खुदरा विक्रेताओं की बलि दी गई है।”

विश्वगुरु की छवि को नाजुक और कृत्रिम बताते हुए संपादकीय ने उन सरकार समर्थक आख्यानों की कड़ी आलोचना की, जो सिंगापुर, यूएई, मॉरीशस और श्रीलंका जैसे देशों में यूपीआई को अपनाने का जश्न मनाते थे और इन जश्नों की तुलना घरेलू शुल्क वृद्धि की वास्तविकता से की।

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार भले ही नकदी रहित और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का दावा करती हो, लेकिन नोटबंदी, जीएसटी लागू करने, महंगाई और अब लेन-देन शुल्क के जरिए मध्यम और श्रमिक वर्ग का शोषण कर रही है। उसने कहा कि डिजिटल परिवर्तन की आड़ में कॉरपोरेट और विदेशी बिचौलियों को फायदा पहुंचाने के लिए नागरिकों से हजारों करोड़ रुपए वसूले जाएंगे।

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