जिनके आवास में एक साल से रह रहे थे केजरीवाल उन्होंने भी छोड़ी पार्टी

घर खाली करने के कुछ ही घंटों बाद अशोक मित्तल भाजपा में हुए शामिल

जिनके आवास में एक साल से रह रहे थे केजरीवाल उन्होंने भी छोड़ी पार्टी

The person in whose residence Kejriwal had been staying for a year also left the party.

आम आदमी पार्टी (AAP) को बड़ा झटका देते हुए राज्यसभा सांसद अशोक कुमार मित्तल ने पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया। खास बात यह है कि उनका यह फैसला अरविंद केजरीवाल के कुछ ही घंटे पहले अपने सरकारी आवास में जाने के बाद आया, जबकि केजरीवाल उनके आवास में एक साल से ठहरे हुए थे।

अशोक मित्तल ने 2024 में अपने फिरोजशाह रोड स्थित सरकारी आवास में केजरीवाल और उनके परिवार को ठहराया था। उस समय केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद यह आवास लिया था। वह करीब एक साल तक वहीं रहे और 24 अप्रैल को लोधी एस्टेट स्थित नए सरकारी बंगले में शिफ्ट हो गए, जो उन्हें एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रमुख के रूप में आवंटित हुआ है।

सूत्रों के मुताबिक, केजरीवाल के आवास खाली करने के कुछ ही घंटों बाद मित्तल ने AAP से इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल होने का ऐलान कर दिया। इस घटनाक्रम को पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।

हालांकि 2 अप्रैल को केजरीवाल ने राज्यसभा में राघव चड्ढा को उपनेता पद से हटाकर अशोक मित्तल को यह जिम्मेदारी सौंपी थी। सूत्रों के अनुसार, इस कदम को चड्ढा को किनारे करने के तौर पर देखा गया, जिससे असंतोष बढ़ा। इसके अलावा, स्वाति मालीवाल का पार्टी नेतृत्व से विवाद भी पहले से चर्चा में था। मई 2024 में उन्होंने केजरीवाल के सहयोगी बिभव कुमार पर मारपीट का आरोप लगाया था, जिसके बाद से उनके और नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ती गई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पार्टी में टूट रोकने के लिए केजरीवाल ने सांसदों से संपर्क किया था और उन्हें भविष्य में अवसर देने का आश्वासन दिया था। उन्होंने कहा था कि यदि किसी को कोई आशंका है तो वह अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं और अगली बार उन्हें फिर से टिकट दिया जाएगा। शुक्रवार शाम को इस मुद्दे पर एक बैठक भी प्रस्तावित थी, लेकिन वह बैठक हो नहीं सकी क्योंकि उससे पहले ही सांसदों ने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया।

AAP के लिए यह घटनाक्रम एक बड़े राजनीतिक संकट के रूप में देखा जा रहा है। राज्यसभा में मजबूत उपस्थिति रखने वाली पार्टी को अब न सिर्फ कानूनी स्तर पर दलबदल का सामना करना पड़ेगा, बल्कि संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर भी नए सिरे से रणनीति बनानी होगी।

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