रंग-बिरंगी पतंगों से सजा आसमान, तिल-गुड़ की मिठास और खिचड़ी की खुशबू के साथ आने वाले उत्तरायण को देश के अधिकांश हिस्सों में मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। यह केवल एक पर्व नहीं बल्कि ऋतु परिवर्तन, सामुदायिक एकता और कृतज्ञता का उत्सव होता है। महाराष्ट्र और गुजरात में यह त्योहार खास तौर पर बड़े उत्साह और भव्यता के साथ मनाया जाता है, जहां जनवरी की साफ नीली छतरी के नीचे दोनों प्रदेश पतंगबाजी में डूब जाते है।
उत्तरायण हर वर्ष सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ मनाया जाता है। यह आमतौर पर 14 या 15 जनवरी को पड़ता है। वर्ष 2026 में यह उत्तरायण बुधवार, 14 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन को शीत ऋतु के अंत और दिनों के धीरे-धीरे लंबे होने की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।
मकर संक्रांति का शाब्दिक अर्थ है, सूर्य का उत्तर दिशा में मकर राशी में संक्रमण। मान्यता है कि इस अवधि में सूर्य देव की ऊर्जा पृथ्वी पर शुभ प्रभाव डालती है, जिससे समृद्धि और सकारात्मकता बढ़ती है। महाभारत से जुड़ी एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, उत्तरायण के दौरान देह त्याग करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस काल को अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो पृथ्वी की अक्षीय गति और खगोलीय गणनाओं के कारण उत्तरायण की तिथि में बदलाव आया है। माना जाता है कि प्राचीन काल में यह पर्व 31 दिसंबर के आसपास मनाया जाता था, जो समय के साथ जनवरी मध्य में स्थिर हो गया।
उत्तरायण को भारत का “हार्वेस्ट थैंक्सगिविंग” भी कहा जा सकता है। तिल और गुड़ से बने लड्डू और चिक्की ठंड के मौसम में शरीर को गर्म रखने में काम आते हैं और महाराष्ट्र में इस तिल और गुड़ से बने लड्डू बांटकर ‘तिल गुल घ्या गोड़ बोला’ अर्थात ‘तिल-गुड़ लिजिए मिठे वचन बोलिए’ की भावना के साथ आपसी सौहार्द बनाया जाता हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में खिचड़ी का विशेष महत्व है, जहां इसे बनाकर गोरखनाथ मंदिर, गोरखपुर में अर्पित किया जाता है।
देश के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन सूर्य उपासना, दान-पुण्य, पवित्र नदियों में स्नान और सामाजिक मेलजोल इसकी साझा विशेषताएं हैं।
गुजरात में उत्तरायण की पहचान पतंगबाजी से होती है। छतों पर उमड़ती भीड़, “कायपो छे” की गूंज और आसमान में लहराती पतंगें इस पर्व को अनोखा बनाती हैं। इसके पीछे वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दोनों कारण बताए जाते हैं। माना जाता है कि सर्दियों के बाद सूर्य की किरणें इस समय सबसे लाभकारी होती हैं और खुले आसमान में समय बिताना स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। साथ ही, यह परंपरा सामूहिक आनंद, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देती है।
उत्तरायण 2026 न केवल मौसम के बदलाव का संकेत है, बल्कि यह परंपरा, विज्ञान, आस्था और सामुदायिक जीवन का सुंदर संगम भी है। पतंगों के साथ सपनों को उड़ान देने और एक-दूसरे के साथ खुशियां बांटने का यह पर्व हर साल नई ऊर्जा और उम्मीद लेकर आता है।
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