भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में जब भी महान वायलिन वादकों का नाम लिया जाएगा, तो लालगुड़ी जयरमन हमेशा अग्रिम पंक्ति में खड़े नज़र आएंगे। उनकी वायलिन से निकली स्वर लहरियां न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति की पहचान बनीं।
लालगुड़ी जयरमन का जन्म 17 सितंबर 1930 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में हुआ था। उनका पूरा नाम लालगुड़ी गोपाल अय्यर जयरमन था। वे महान कर्नाटक संगीतकार त्यागराज के वंशज थे। संगीत उन्हें विरासत में मिला और पिता वी.आर. गोपाल अय्यर के मार्गदर्शन में बचपन से ही उनकी कला निखरने लगी। महज 12 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार मंच पर वायलिन बजाकर सबका ध्यान खींचा।
उन्होंने अपनी विशिष्ट शैली को जन्म दिया, जिसे आज ‘लालगुड़ी बानी’ कहा जाता है। इसमें राग, ताल और लय का ऐसा संतुलन देखने को मिलता है, जो बेहद भावपूर्ण और गहराई से श्रोताओं को छू लेता है।
उनकी कला का वैश्विक प्रमाण 1979 में सामने आया, जब दिल्ली के ऑल इंडिया रेडियो में रिकॉर्ड की गई उनकी प्रस्तुति को बगदाद की अंतरराष्ट्रीय संगीत परिषद ने दुनिया भर से आई 77 रिकॉर्डिंग्स में सबसे श्रेष्ठ चुना। यह क्षण भारतीय संगीत के लिए गर्व का था और जयरमन के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि।
इससे पहले 1965 में स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग संगीत महोत्सव में उनकी प्रस्तुति ने विश्वविख्यात वायलिन वादक यहूदी मेनुहिन को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपनी इतालवी वायलिन उन्हें उपहार में दे दी।
जयरमन ने न केवल वायलिन वादन, बल्कि नृत्य रचनाओं में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और संस्कृत भाषाओं में अनगिनत रचनाएं तैयार कीं, जो आज भी नर्तकों और संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं।
उनके योगदान को देश-विदेश में सम्मानित किया गया। उन्हें 1972 में पद्मश्री, 1979 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1994 में मैरीलैंड की मानद नागरिकता, 2001 में पद्मभूषण, और 2006 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
लालगुड़ी जयरमन का निधन 22 अप्रैल 2013 को हुआ, लेकिन उनकी धरोहर और ‘लालगुड़ी बानी’ आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा बनकर जीवित है।
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