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पालक पनीर के विवाद से भारतीय छात्रों को मिला ₹1.66 करोड़ मुआवजा

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अमेरिका के एक विश्वविद्यालय परिसर में मामूली-सा लगने वाला भोजन से जुड़ा विवाद आखिरकार एक बड़े नागरिक अधिकार (सिविल राइट्स) मामले में बदल गया। भारतीय व्यंजन पालक पनीर को माइक्रोवेव में गर्म करने से उपजा यह विवाद इतना बढ़ा कि दो भारतीय छात्रों को अंततः करीब ₹1.66 करोड़ (लगभग 2 लाख अमेरिकी डॉलर) का कानूनी मुआवजा मिला।

यह मामला यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर (University of Colorado Boulder) से जुड़ा है, जहां दो भारतीय डॉक्टरेट छात्र आदित्य प्रकाश और उर्मि भट्टाचार्य ने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ भेदभाव के आरोप लगाते हुए मुकदमा दायर किया था।

भोपाल से आने वाले आदित्य प्रकाश विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलॉजी विभाग में पीएचडी कर रहे थे। उनकी साथी उर्मि भट्टाचार्य उस समय उसी विश्वविद्यालय में पीएचडी छात्रा थीं। दोनों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि वे मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं और अमेरिका में पढ़ाई के लिए उन्होंने अपनी लगभग सारी बचत झोंक दी थी। शुरुआती एक साल तक सब कुछ सामान्य रहा, आदित्य को रिसर्च ग्रांट्स मिले और उर्मि के शोध कार्य भी सराहा गया।

हालांकि 5 सितंबर 2023 को एक विवाद उपजा।आदित्य प्रकाश कैंपस में छात्रों के लिए उपलब्ध माइक्रोवेव में अपना दोपहर का खाना पालक पनीर गर्म कर रहे थे। उसी दौरान एक स्टाफ सदस्य ने उनके पास आकर खाने की तेज गंध की शिकायत की। आदित्य को कहा गया कि वे माइक्रोवेव का इस्तेमाल न करें।

आदित्य के अनुसार, स्टाफ सदस्य ने कहा, “The smell is pungent.” इस पर उन्होंने शांत रहते हुए जवाब दिया कि यह सिर्फ खाना है और वह उसे गर्म कर के चले जाएंगे। आदित्य ने आगे तर्क दिया कि खाने की गंध को अच्छा या बुरा मानना सांस्कृतिक नजरिये पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा, “मुझे मेरे खाने पर गर्व है। और किसी को क्या चीज़ अच्छी या बुरी महकती है, इसके बारे में धारणाएँ कल्चर से तय होती हैं।”

इस घटना के बाद दोनों छात्रों ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय में रसोई और भोजन से जुड़े नियमों को उनके साथ भेदभावपूर्ण तरीके से लागू किया गया। उनका दावा था कि अन्य छात्रों के भोजन पर ऐसी आपत्ति नहीं की जाती थी और भारतीय भोजन को अप्रिय बताना सांस्कृतिक भेदभाव के दायरे में आता है।

मामला आगे बढ़ते हुए एक सिविल राइट्स मुकदमे में तब्दील हो गया, जिसमें विश्वविद्यालय पर नस्लीय और सांस्कृतिक भेदभाव के आरोप लगाए गए। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद दोनों पक्षों के बीच अदालत के बाहर समझौता हुआ।

समझौते के तहत विश्वविद्यालय ने करीब ₹1.66 करोड़ के मुआवजे का भुगतान करने पर सहमति जताई। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने किसी भी प्रकार के भेदभाव को स्वीकार करने से इनकार किया, लेकिन यह राशि मामले के निपटारे के लिए दी गई।

यह मामला अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों, खासकर एशियाई और भारतीय छात्रों के सामने आने वाली सांस्कृतिक संवेदनशीलता और भेदभाव से जुड़े मुद्दों को उजागर करता है। पालक पनीर से पनपा साधारण विवाद किस तरह कानूनी और नागरिक अधिकारों की बहस में बदल सकता है, यह घटना उसी का उदाहरण बन गई है।

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