संयुक्त राज्य अमेरिका में एक वैज्ञानिक द्वारा घर पर विकसित की गई तथाकथित “बीयर-वैक्सीन” ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नैतिक, वैज्ञानिक और नियामक बहस छेड़ दी है। यह प्रयोग न केवल औपचारिक संस्थागत ढांचे से बाहर किया गया, बल्कि इसके शुरुआती नतीजे बिना किसी पीयर-रिव्यू के सार्वजनिक मंच पर साझा कर दिए गए।
नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) से जुड़े 13 मानव पॉलीओमावायरस में से चार की खोज करने वाले वायरोलॉजिस्ट क्रिस बक इस विवाद के केंद्र में हैं। बक ने अपने घर की रसोई में एक ऐसी बीयर विकसित की, जिसमें आनुवंशिक रूप से संशोधित यीस्ट का उपयोग किया गया। यह यीस्ट BK पॉलीओमावायरस जैसे कण उत्पन्न करता है, जो इम्यूनो-कम्प्रोमाइज्ड मरीजों में गंभीर जटिलताओं और कुछ कैंसर से जुड़ा माना जाता है।
बक के अनुसार, इस प्रयोगात्मक बीयर को पीने के बाद उनके शरीर में वायरस के विभिन्न उपप्रकारों के खिलाफ एंटीबॉडीज़ बनीं और तत्काल कोई प्रतिकूल प्रभाव दर्ज नहीं हुआ। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनके करीबी परिवार के कुछ सदस्यों ने भी यह बीयर पी, जिससे आत्म-प्रयोग (self-experimentation) की सीमाओं और नैतिकता पर सवाल और गहरे हो गए।
सायंस न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में बक ने कहा कि शुरुआती नतीजे लाइव यीस्ट-आधारित ओरल वैक्सीन की वास्तविक प्रतिरक्षात्मक क्षमता की ओर इशारा करते हैं।
17 दिसंबर को बक ने अपने प्रयोग से जुड़े शुरुआती डेटा को ज़ेनडो नामक ओपन-एक्सेस प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित किया। यह डेटा किसी भी औपचारिक पीयर-रिव्यू प्रक्रिया से नहीं गुजरा था। इसके अलावा, उन्होंने वैक्सीन बीयर बनाने की विस्तृत विधि अपने निजी ब्लॉग पर भी साझा की और इसे पूर्ण पारदर्शिता का उदाहरण बताया।
सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों में चूहों पर किए गए प्रयोगों के नतीजे और मनुष्यों में आत्म-प्रयोग से जुड़ी जानकारियां शामिल थी। वैज्ञानिक समुदाय के कई सदस्यों ने इस पर चिंता जताई कि बिना स्वतंत्र मूल्यांकन और औपचारिक क्लिनिकल प्रोटोकॉल के इस तरह का प्रकाशन सुरक्षा, वैधता और गलत व्याख्या के जोखिम बढ़ाता है।
NIH की नैतिक समितियों ने इस प्रकार के आत्म-प्रयोग को अस्वीकार किया है और पारंपरिक वैज्ञानिक रिपॉजिटरी में डेटा प्रकाशित करने पर भी सवाल उठाए हैं। बक का तर्क है कि यह काम उन्होंने किसी आधिकारिक प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि निजी स्तर पर किया, इसलिए यह संस्थागत नियमों के दायरे में नहीं आता।
इन्हीं सीमाओं से बचने के लिए उन्होंने “गुस्तो रिसर्च कॉरपोरेशन” नामक एक गैर-लाभकारी संस्था बनाई, जिसका नाम फिल्म Ratatouille से प्रेरित है और यह विचार दर्शाता है कि कोई भी विज्ञान कर सकता है।
बक का कहना है कि चूंकि इस्तेमाल किया गया यीस्ट मानव उपभोग के लिए सुरक्षित माना जाता है, इसलिए इस बीयर को भोजन या सप्लीमेंट की श्रेणी में रखा जा सकता है। उनके अनुसार, इससे पारंपरिक वैक्सीन की लंबी क्लिनिकल ट्रायल प्रक्रिया से बचा जा सकता है।
हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि प्रतिरक्षा उत्पन्न करने के उद्देश्य से बनाए गए वायरल कण व्यावहारिक रूप से औषधीय उत्पाद ही होते हैं। भोजन और दवा के बीच यह भ्रम भविष्य में खतरनाक उदाहरण स्थापित कर सकता है।
इस परियोजना की जड़ें 15 साल पुराने BK पॉलीओमावायरस के इंजेक्टेबल वैक्सीन शोध में हैं। पशु प्रयोगों में यीस्ट से बने वायरल कणों ने मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया दिखाई थी। इसके बावजूद, मानव स्तर पर डेटा बेहद सीमित है और दीर्घकालिक प्रभावों का कोई आकलन नहीं हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि “बीयर-वैक्सीन” जैसी अवधारणा वैश्विक स्तर पर वैक्सीन को लेकर भ्रम फैला सकती है और जन-विश्वास को नुकसान पहुंचा सकती है, खासकर ऐसे समय में जब गलत सूचना पहले से ही एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
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