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गेहूं के खेतों में मिलने वाली जड़ी-बूटी के चमत्कारी गुण,आधुनिक चिकित्सा भी मानती है इसका लोहा!

मुंह की बदबू और दंत समस्याओं में भी यह पौधा कारगर साबित होता है। इसके काढ़े से गरारा करने से न केवल मुंह की दुर्गंध दूर होती है, बल्कि मसूड़ों से जुड़ी समस्याओं में भी राहत मिलती है। यह पाचन क्रिया को भी बेहतर बनाता है और गैस्ट्रिक समस्याओं से निजात दिलाने में सहायक है।

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गेहूं के खेतों में उगने वाली पित्तपापड़ा घास को आमतौर पर लोग बेकार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन आयुर्वेद में इसे एक चमत्कारी औषधि माना जाता है। इस पौधे का प्रयोग प्राचीन काल से विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता रहा है। इसके पत्तों में वात, पित्त और कफ दोषों को संतुलित करने की क्षमता होती है, जिससे यह पाचन तंत्र को सुधारने, बुखार कम करने और त्वचा संबंधी विकारों को दूर करने में बेहद कारगर है।

आयुर्वेदिक ग्रंथों जैसे चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में भी पित्तपापड़ा के औषधीय गुणों का उल्लेख किया गया है। यह घास तिक्त, कटु और शीतल प्रभाव वाली होती है, जो शरीर में होने वाली जलन को शांत करने में मदद करती है। जलने या घाव होने की स्थिति में इसके पत्तों का रस लगाने से राहत मिलती है, जबकि इसके काढ़े का सेवन आंतरिक सूजन को कम करने में सहायक होता है।

बुखार के उपचार में भी इसका उपयोग प्रभावी है। आयुर्वेद में इसे पित्तज्वर यानी पित्त के असंतुलन से होने वाले बुखार में लाभकारी माना गया है। इसके लिए पित्तपापड़ा के काढ़े में सोंठ चूर्ण मिलाकर सेवन किया जाता है, जिससे शरीर का तापमान नियंत्रित होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसके अलावा, यह काढ़ा सर्दी-जुकाम और कब्ज जैसी समस्याओं में भी राहत देता है।

त्वचा संबंधी विकारों में भी पित्तपापड़ा उपयोगी है। इसके रस को बाहरी रूप से लगाने से खुजली, दाद और फंगल संक्रमण में लाभ मिलता है। आंखों की समस्याओं के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसके रस को आंखों के आस-पास लगाने से सूजन और खुजली में आराम मिलता है। हालांकि, इसे सीधे आंखों के अंदर नहीं डालना चाहिए।

मुंह की बदबू और दंत समस्याओं में भी यह पौधा कारगर साबित होता है। इसके काढ़े से गरारा करने से न केवल मुंह की दुर्गंध दूर होती है, बल्कि मसूड़ों से जुड़ी समस्याओं में भी राहत मिलती है। यह पाचन क्रिया को भी बेहतर बनाता है और गैस्ट्रिक समस्याओं से निजात दिलाने में सहायक है। पेट के कीड़ों को खत्म करने के लिए पित्तपापड़ा को विडंग के साथ मिलाकर सेवन किया जाता है।

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आधुनिक चिकित्सा भी अब इसके औषधीय गुणों को स्वीकार करने लगी है। वैज्ञानिक शोध में यह पाया गया है कि इसमें एंटीऑक्सीडेंट और एंटीबैक्टीरियल तत्व होते हैं, जो संक्रमण से बचाने में मदद करते हैं। यह पौधा शरीर को अंदरूनी तौर पर स्वस्थ रखने में सहायक है और इसकी नियमित मात्रा में खपत कई बीमारियों को दूर रखने में मदद कर सकती है। इसके इतने लाभों को देखते हुए इसे सिर्फ एक घास समझकर नजरअंदाज करना बड़ी भूल होगी, क्योंकि यह वास्तव में प्रकृति का अनमोल उपहार है।

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