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12 मिनट तक चला स्क्रैमजेट इंजन, ‘मैक-6 मिसाइल युग’ की दिशा में भारत की छलांग

DRDO का बड़ा हाइपरसोनिक ब्रेकथ्रू

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भारत ने हाइपरसोनिक तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने अपने हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकी प्रदर्शन वाहन कार्यक्रम के तहत स्क्रैमजेट इंजन का 12 मिनट तक सफल ग्राउंड टेस्ट किया। यह परीक्षण भारत की हाइपरसोनिक क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है और इससे मच-6 से अधिक गति वाली एयर-ब्रीदिंग हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों के विकास का रास्ता खुल सकता है।

रिपोर्टों के अनुसार, यह परीक्षण हाइपरसोनिक गति पर इंजन के लंबे समय तक संचालन को साबित करता है। इससे पहले 2020 में हुए परीक्षण में स्क्रैमजेट इंजन लगभग 20 सेकंड तक ही चल पाया था। नए परीक्षण में 12 मिनट तक निरंतर संचालन से यह स्पष्ट हुआ कि भारत की स्क्रैमजेट तकनीक अब कहीं अधिक परिपक्व हो चुकी है।

HSTDV को लगभग मैक-6 की गति के लिए डिजाइन किया गया है, जो करीब 7,000 किलोमीटर प्रति घंटे के बराबर होती है। इतनी तेज गति के कारण इस तकनीक पर आधारित हथियार अत्यंत तेज, अत्यधिक गतिशील और पारंपरिक एयर डिफेंस प्रणालियों जैसे मिसाइल इंटरसेप्टर और रडार नेटवर्क से बच निकलने में सक्षम हो सकते हैं।

इस प्रगति का एक प्रमुख कारण उन्नत थर्मल मैनेजमेंट और एक्टिव कूलिंग तकनीक है। हाइपरसोनिक उड़ान के दौरान इंजन और संरचना पर अत्यधिक तापमान पैदा होता है, जिसे नियंत्रित करना सबसे बड़ी तकनीकी चुनौतियों में से एक माना जाता है। DRDO द्वारा विकसित एक्टिव कूलिंग सिस्टम इंजन की दीवारों में कूलेंट प्रवाहित करके अत्यधिक तापमान को नियंत्रित करता है और संरचना को सुरक्षित रखता है।

रणनीतिक दृष्टि से यह कार्यक्रम भारत की लंबी दूरी की हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों के विकास की नींव माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक के परिपक्व होने से भारतीय सशस्त्र बलों की त्वरित और सटीक प्रहार क्षमता काफी बढ़ जाएगी, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

यह उपलब्धि भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में मजबूती से स्थापित करती है जो हाइपरसोनिक तकनीक पर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इनमें अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश शामिल हैं।

रक्षा क्षेत्र के अलावा इस तकनीक के नागरिक उपयोग की भी संभावना है। DRDO का मानना है कि HSTDV आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल कम लागत में छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए किया जा सकता है, जिससे भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलेगा और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के साथ मिलकर देश की अंतरिक्ष क्षमताओं को विस्तार मिल सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य में इस तकनीक के उड़ान परीक्षण और उन्नत प्रोटोटाइप विकसित किए जाने की उम्मीद है, जो अगले दशक की शुरुआत तक भारतीय सशस्त्र बलों के लिए नई पीढ़ी की हाइपरसोनिक प्रणालियों का आधार बन सकते हैं।

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