केन्या सीमा के पास उत्तरी तंजानिया के सुदूर इलाके में स्थित लेक नट्रोन दुनिया की सबसे रहस्यमयी और असाधारण झीलों में गिनी जाती है। करीब 15 लाख वर्ष पहले बनी यह झील अपने रक्त-लाल रंग और जानवरों को पत्थर बना देने वाली कहानियों के कारण वैश्विक स्तर पर चर्चा में रही है। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों और सनसनीखेज सुर्खियों ने इस झील को रहस्य और डर का प्रतीक बना दिया, लेकिन इसकी असल कहानी वैज्ञानिक रूप से उतनी ही रोचक है जितनी दिखने में भयावह।
दरअसल लेक नट्रोन का लाल या गुलाबी रंग सूक्ष्म जीवों की वजह से है, जो इसकी अत्यधिक क्षारीय (अल्कलाइन) परिस्थितियों में पनपते हैं। झील का pH स्तर 10.5 तक पहुंच सकता है, जो अमोनिया जितना क्षारीय माना जाता है।
इस पानी में सोडियम कार्बोनेट और अन्य खनिजों की मात्रा अधिक है। इसका प्रमुख कारण पास स्थित Ol Doinyo Lengai ज्वालामुखी है, जो दुनिया का एकमात्र सक्रिय कार्बोनेटाइट ज्वालामुखी है। ज्वालामुखीय गतिविधियों से निकलने वाले खनिज झील के पानी को विशिष्ट रासायनिक संरचना देते हैं।
सूखे मौसम में जब पानी तेजी से वाष्पित होता है और नमक की सांद्रता बढ़ती है, तब ‘हेलोफिलिक’ (नमक-प्रिय) सूक्ष्म जीव जैसे सायनोबैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं। ये लाल और नारंगी रंगद्रव्य बनाते हैं, जिससे झील का पानी खून जैसा लाल या दूर से गुलाबी दिखता है। लेक नैट्रॉन को लेकर सबसे चर्चित दावा यह है कि यह झील जानवरों को “पत्थर” में बदल देती है। हालांकि, सच्चाई कुछ अलग है।
सच्चाई यह है की झील का अत्यधिक क्षारीय पानी और उसमें मौजूद सोडियम कार्बोनेट मृत जीवों को संरक्षित कर देता है। यदि कोई पक्षी या जानवर झील में गिरकर मर जाता है, तो उसके शरीर पर खनिजों की परत जम जाती है। यह प्रक्रिया कैल्सीफिकेशन कहलाती है, जिससे शव ममी की तरह संरक्षित हो जाता है और देखने में पत्थर जैसा लगता है।
यह कोई तात्कालिक जादुई परिवर्तन नहीं है, बल्कि मृत्यु के बाद होने वाली रासायनिक प्रक्रिया है। इस झील की भयावह छवियों को वैश्विक पहचान दिलाने का श्रेय फोटोग्राफर निक ब्रांट को जाता है। अपनी किताब Across the Ravaged Land में उन्होंने झील किनारे मिले कैल्सीफाइड पक्षियों की तस्वीरें प्रकाशित कीं, जिसने इस झील की रहस्यमयी छवि को और मजबूत किया।
कठोर रासायनिक संरचना के बावजूद, लेक नैट्रॉन जीवन से पूरी तरह खाली नहीं है। यह पूर्वी अफ्रीका के ‘लेसर फ्लेमिंगो’ का प्रमुख प्रजनन स्थल है।
लैसर फ्लेमिंगो जैसी प्रजातियां इन चरम परिस्थितियों में भी फलती-फूलती हैं। उनकी त्वचा और विशेष ग्रंथियां उन्हें क्षारीय पानी से बचाती हैं। वे उन्हीं सायनोबैक्टीरिया पर निर्भर रहती हैं, जो झील को लाल रंग देते हैं।

चूंकि अधिकांश शिकारी ऐसे वातावरण में जीवित नहीं रह पाते, इसलिए फ्लेमिंगो यहां अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते हैं। हर वर्ष लाखों फ्लेमिंगो झील के उथले किनारों पर एकत्र होते हैं, जिससे तट का बड़ा हिस्सा गुलाबी रंग की चादर जैसा दिखाई देता है।
लेक नैट्रॉन की गहराई अक्सर तीन मीटर से कम रहती है और गर्मियों में पानी का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। वाष्पीकरण दर अधिक होने से सतह पर नमक की परतें बन जाती हैं।
इन अत्यधिक परिस्थितियों में केवल विशेष प्रकार के जीव ही जीवित रह सकते हैं। यही वजह है कि यह झील एक ओर जहां मृत जीवों को संरक्षित कर रहस्य पैदा करती है, वहीं दूसरी ओर अफ्रीका की एक प्रतिष्ठित पक्षी प्रजाति के लिए सुरक्षित आश्रय भी प्रदान करती है।
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