तमिलनाडु में मिला 5,300 साल पुराना लौह युग का सबसे लंबा भाला

8 फीट का हथियार असाधारण स्थिति में बरामद

तमिलनाडु में मिला 5,300 साल पुराना लौह युग का सबसे लंबा भाला

The longest Iron Age spear, dating back 5,300 years, has been discovered in Tamil Nadu.

तमिलनाडु में पुरातत्वविदों ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज करते हुए लौह युग के एक विशाल भाले ढूंढ निकाला है, जिसे अब तक भारत में मिला सबसे लंबा लोहे का भाला माना जा रहा है। यह भाला लगभग आठ फीट लंबा है और इसे थूथुकुडी (तूतीकोरिन) जिले के तिरुमलापुरम क्षेत्र में स्थित एक लौह युगीन समाधि स्थल से बरामद किया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह भाला लगभग 3345 ईसा पूर्व का है, यानी इसकी उम्र करीब 5,300 वर्ष आंकी जा रही है।

 

पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इतनी प्राचीन धरोहर का इस हद तक सुरक्षित रहना असाधारण है। विशेषज्ञों का मानना है कि तमिलनाडु की शुष्क मिट्टी और विशेष भौगोलिक परिस्थितियों ने लोहे को हजारों वर्षों तक संरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाई। इस मुख्य भाले के साथ-साथ लगभग 6.5 फीट लंबा एक दूसरा भाला भी मिला है। इसके अलावा, उसी स्थल पर एक कलश भी पाया गया, जिसके भीतर सोने की वस्तुएं रखी हुई थीं। इन सभी अवशेषों ने इस स्थल को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भालों की स्थिति साधारण दफन प्रक्रिया की ओर इशारा नहीं करती। दोनों भाले एक-दूसरे को काटते हुए ‘एक्स’ (X) आकार में रखे गए थे, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह व्यवस्था किसी विशेष अनुष्ठान या सामाजिक प्रतीक से जुड़ी हो सकती है। पुरातत्वविदों का मानना है कि ये हथियार केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि पशुधन और संचित संपत्ति की रक्षा जैसे कार्यों में भी इस्तेमाल किए जाते होंगे, जो उस समय समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थे।

इतिहासकारों और धातु विशेषज्ञों के अनुसार, इतने बड़े लोहे के भाले का निर्माण उस समय की उन्नत तकनीकी क्षमता को दर्शाता है। लोहे को गलाने के लिए लगभग 1,200 से 1,500 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उस दौर में क्षेत्र में विकसित भट्टियां और कुशल धातुकर्मी मौजूद थे। यह खोज दक्षिण भारत में लौह युगीन तकनीक और सामाजिक संरचना की समझ को और गहराई प्रदान करती है।

इस खोज के विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन के लिए तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग ने IIT गांधीनगर के धातुकर्म विभाग के साथ सहयोग शुरू किया है। यह संयुक्त शोध परियोजना 2028 तक चलेगी, जिसके तहत राज्य के अन्य लौह युगीन स्थलों का भी अध्ययन किया जाएगा।

ऐसी महत्वपूर्ण खोजें केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं हैं। हाल के वर्षों में बिहार के विभिन्न हिस्सों में भी प्राचीन मूर्तियों की खोज हुई है। इनमें नालंदा, गया और वैशाली से प्राप्त 1,200 से 2,000 वर्ष पुरानी बुद्ध प्रतिमाएं, जमुई के नागार्जुनी पहाड़ियों से मिली लगभग 1,500 वर्ष पुरानी गणेश प्रतिमा, तथा लखीसराय और मधुबनी जैसे जिलों से प्राप्त पाल कालीन विष्णु और सूर्य प्रतिमाएं शामिल हैं। इसके अलावा, नवादा और गया में एक हजार वर्ष से अधिक पुरानी जैन तीर्थंकर प्रतिमाएं भी मिली हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की खोजें भारत की प्राचीन तकनीकी दक्षता, सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं पर नई रोशनी डालती हैं और हजारों साल पुराने जीवन की जटिलताओं को समझने में मदद करती हैं।

यह भी पढ़ें:

राष्ट्रपति के भाषण विरोध पर रिजिजू बोले, जिम्मेदार सांसद ऐसा व्यवहार नहीं करते

‘ये दोहरे चरित्र की सरकार है,’ माघ मेला से बिना स्नान किए वापस जा रहे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद 

अहमदाबाद एयरपोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी, सुरक्षा एजेंसी अलर्ट!

Exit mobile version