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मुस्लिम महिला को मिला विवाह-विच्छेद का स्वातंत्र्य, पति के रज़ामंदी के बिना होगा खुला!

यदि पत्नी यह महसूस करती है कि वह पति के साथ आगे नहीं रह सकती, तो वह खुला की मांग कर सकती है।

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तेलंगाना हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया कि मुस्लिम महिला को ‘खुला’ (Khula) के ज़रिए अपने विवाह को समाप्त करने का पूर्ण अधिकार है, और इसके लिए न तो पति की सहमति और न ही किसी धार्मिक संस्था की अनुमति आवश्यक है। यह निर्णय वैवाहिक समानता, मुस्लिम निजी कानून और संविधान में निहित लैंगिक न्याय के सिद्धांतों पर बहस को एक बार फिर से सामने लाता है।

‘मो. आरिफ अली बनाम अफसरुन्निसा’ मामले में न्यायमूर्ति मौसमी भट्टाचार्य और बीआर मधुसूदन राव की पीठ ने 25 जून 2025 को फैसला सुनाया। इस मामले में महिला ने 2017 में पति द्वारा मारपीट किए जाने के बाद ‘खुला’ के माध्यम से तलाक लिया था, जिसे पति ने अस्वीकार कर दिया। बाद में धार्मिक सलाहकार संस्था ‘सदा-ए-हक शरई काउंसिल’ ने पति को तीन बार नोटिस भेजा, लेकिन जवाब नहीं मिला। इसके बाद 2020 में ‘खुलानामा’ जारी किया गया, जिसे पति ने अदालत में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘खुला’ महिला का पूर्णाधिकार है और इसे किसी धार्मिक संस्था या पति की सहमति से बाधित नहीं किया जा सकता।

क्या होता है खुला तलाक?

मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एक्ट, 1937 के तहत चार प्रकार के तलाक को मान्यता दी गई है — तलाक-ए-अहसन, तलाक-ए-हसन, मुबारत और खुला। इनमें ‘खुला’ एकमात्र ऐसा तरीका है जो सिर्फ पत्नी द्वारा आरंभ किया जा सकता है। इसमें पत्नी मेहर वापस देकर शादी समाप्त कर सकती है। वहीं, ‘तलाक’ पति द्वारा शुरू किया जाता है और इसमें मेहर पति को देना होता है। ‘मुबारत’ दोनों पक्षों की आपसी सहमति से होता है।

2017 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘तलाक-ए-बिद्दत’ यानी ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार दिया था और 2019 में उसे एक आपराधिक अपराध बना दिया गया। हाईकोर्ट ने यह दो टूक कहा कि ‘खुला’ महिला का धार्मिक और कानूनी अधिकार है, जिसे कुरान के अध्याय II, आयत 229 में भी स्वीकार किया गया है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक निकायों को तलाक प्रमाणपत्र जारी करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है, और केवल नागरिक अदालतें ही तलाक को वैध बना सकती हैं।

हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि पति इस तलाक को चुनौती देना चाहे तो अदालत में कर सकता है, लेकिन विवाह समाप्त करने का अधिकार सिर्फ पत्नी के निर्णय पर आधारित रहेगा।

तलाक़ और खुला में फर्क क्या?

मुस्लिम वैवाहिक कानूनों में तलाक और खुला, दोनों विवाह विच्छेद के विधिक रूप हैं, लेकिन इनकी प्रकृति, प्रक्रिया और अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण अंतर हैं। ‘तलाक’ वह प्रक्रिया है जो पति द्वारा आरंभ की जाती है, जबकि ‘खुला’ वह विशेषाधिकार है जो केवल पत्नी को प्राप्त होता है। जब पति तलाक देता है, तो वह पत्नी को बिना उसकी सहमति के भी तलाक दे सकता है (हालांकि अब यह भी न्यायिक निगरानी में आता है), और उसे पत्नी को मेहर तथा विवाह के समय दी गई संपत्ति लौटानी होती है। वहीं, जब पत्नी खुला के ज़रिए विवाह समाप्त करना चाहती है, तो उसे आमतौर पर अपना मेहर लौटाना होता है, क्योंकि वह विवाह से स्वेच्छा से अलग हो रही होती है।

यदि पत्नी यह महसूस करती है कि वह पति के साथ आगे नहीं रह सकती, तो वह खुला की मांग कर सकती है, और उसके निर्णय पर अंतिम मुहर लगाना न्यायालय का काम होता है, न कि पति की स्वीकृति। दूसरी ओर, तलाक एक पुरुष-प्रेरित प्रक्रिया है, जिसमें पति तीन बार ‘तलाक’ बोलकर विवाह को तोड़ सकता है (हालांकि ‘तलाक-ए-बिद्दत’ या एकसाथ तीन बार तलाक अब गैरकानूनी है)।

एक और महत्वपूर्ण अंतर उनके पुनर्विवाह के अधिकार को लेकर है। खुला के बाद, यदि पति-पत्नी दोनों सहमत हों, तो वे आपस में दोबारा विवाह कर सकते हैं। जबकि तलाक के बाद, अगर कोई पति अपनी पूर्व पत्नी से दोबारा विवाह करना चाहता है, तो शरीयत के अनुसार पत्नी को पहले किसी अन्य व्यक्ति से विवाह करना होता है और फिर उससे तलाक लेना होता है (जिसे ‘हलाला’ कहा जाता है)। यह प्रक्रिया न केवल जटिल है बल्कि विवादास्पद भी रही है।

1972 में केरल हाईकोर्ट के एकल पीठ ने ‘खुला’ को अवैध ठहराया था, लेकिन 2022 में उसी अदालत की द्वि-पीठ ने इसे पलटते हुए कहा था कि खुला महिला का पूर्ण धार्मिक अधिकार है। 2023 में केरल हाईकोर्ट ने एक अन्य फैसले में यह भी कहा था कि खुला के तहत तलाक लेने वाली पत्नी CrPC की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण की हकदार नहीं होती, क्योंकि यह खुद सहवास से इंकार का रूप माना गया।

तेलंगाना हाईकोर्ट का यह नया फैसला न केवल महिलाओं के अधिकारों को मज़बूती देता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका ही अंतिम प्राधिकारी है और धार्मिक निकायों की भूमिका सीमित है। यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता और वैवाहिक समानता के बीच संतुलन स्थापित करता है और भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

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