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भारत-ओमान समुद्री विरासत को पुनर्जीवित करने वाली ऐतिहासिक यात्रा!

कौंडिन्य प्रतीकात्मक रूप से उन ऐतिहासिक समुद्री मार्गों का पुनर्मूल्यांकन करेगा, जिन्होंने सहस्राब्दियों से भारत को व्यापक हिंद महासागर दुनिया से जोड़ा है।

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भारतीय नौसेना का स्वदेशी रूप से निर्मित पारंपरिक ‘स्टिच्ड’ सेलिंग वेसल आईएनएसवी कौंडिन्य अपनी पहली विदेश यात्रा पर निकला है। सोमवार को यह समुद्री जहाज गुजरात के पोरबंदर से ओमान की राजधानी मस्कट के लिए रवाना हुआ। यह ऐतिहासिक यात्रा भारत की प्राचीन समुद्री विरासत को पुनर्जीवित करने, समझने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने का एक जीवंत प्रयास है।

यह भारतीय नौसैनिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। इस पारंपरिक पोत को पश्चिमी नौसैनिक कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामिनाथन ने औपचारिक रूप से फ्लैग-ऑफ किया। कार्यक्रम में ओमान के भारत स्थित राजदूत भारतीय नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी और अन्य विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे, जिन्होंने इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनते हुए दोनों देशों के गहरे समुद्री संबंधों को रेखांकित किया।

कौंडिन्य को सदियों पुराने पारंपरिक ‘स्टिच्ड शिपबिल्डिंग’ तरीकों से बनाया गया है। इसमें जहाज के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने के लिए लोहे की कीलों के बजाय प्राकृतिक सामग्री और रस्सियों का उपयोग किया गया है। ऐतिहासिक स्रोतों, शिल्पकला और पुरातात्त्विक साक्ष्यों से प्रेरित यह पोत भारत की समुद्री कारीगरी, नौसंचालन क्षमता और स्वदेशी जहाज निर्माण परंपरा की समृद्ध धरोहर का प्रतिनिधित्व करता है।

नौसेना के मुताबिक यह यात्रा उन प्राचीन समुद्री मार्गों को पुनर्जीवित करती है जो कभी भारत के पश्चिमी तट और ओमान के बीच व्यापार, सांस्कृतिक संपर्क और सभ्यतागत आदान-प्रदान का माध्यम रहे हैं। यह अभियान भारत और ओमान के बीच द्विपक्षीय संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

मस्कट में नौसेना के कौंडिन्य का आगमन दोनों देशों के सदियों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों, आपसी विश्वास और सामुद्रिक जुड़ाव का प्रतीक होगा। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक यह यात्रा गुजरात और ओमान के ऐतिहासिक समुद्री संपर्कों को भी उजागर करती है, जो आज भी व्यापारिक और सांस्कृतिक सहयोग के रूप में जीवित हैं।

कौण्डिन्य का यह समुद्री अभियान भारतीय नौसेना की समुद्री कूटनीति, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और हिंद महासागर क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह पहल भारत की प्राचीन समुद्री सभ्यता, उसकी नौवहन परंपरा और जिम्मेदार समुद्री राष्ट्र के रूप में उसकी भूमिका को नई ऊर्जा प्रदान करती है।

इस समुद्री अभियान का नेतृत्व कमांडर विकास श्योराण कर रहे हैं, जबकि परियोजना के प्रारंभिक चरण से जुड़े कमांडर वाई. हेमंत कुमार अभियान के ऑफिसर-इन-चार्ज की भूमिका निभा रहे हैं। पोत पर कुल चार अधिकारी और 13 नौसैनिक इस ऐतिहासिक यात्रा पर तैनात हैं।

कौंडिन्य प्रतीकात्मक रूप से उन ऐतिहासिक समुद्री मार्गों का पुनर्मूल्यांकन करेगा, जिन्होंने सहस्राब्दियों से भारत को व्यापक हिंद महासागर दुनिया से जोड़ा है। अपनी इस यात्रा के जरिए यह पोत भारत की प्राचीन जहाज निर्माण और समुद्री परंपराओं को पुन साकार करेगा। इसे प्राचीन भारतीय पोतों के चित्रण से प्रेरणा लेते हुए पूरी तरह से पारंपरिक सिलाई-तख्ता तकनीक का उपयोग करके निर्मित किया गया है।

रक्षा मंत्रालय का कहना है कि आईएनएसवी कौंडिन्य इतिहास, शिल्प कौशल और आधुनिक नौसैनिक विशेषज्ञता का एक दुर्लभ संगम है। समकालीन पोतों के विपरीत, इसके लकड़ी के तख्तों को नारियल के रेशे की रस्सी से सिला गया है और प्राकृतिक राल से सील किया गया है।

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