भारत अब वायु शक्ति के भविष्य को ध्यान में रखते हुए छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की दिशा में रणनीतिक कदम बढ़ा रहा है। भारतीय वायुसेना (IAF) ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह पूरी तरह स्वदेशी तौर पर नया प्लेटफॉर्म विकसित करने के बजाय किसी अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में भागीदारी के माध्यम से अत्याधुनिक तकनीक हासिल करना चाहती है। वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल ही में इस दिशा में भारत की सोच को रेखांकित करते हुए कहा कि चीन की तेज प्रगति ने इस आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।
जानकारी के अनुसार चीन पहले ही छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान से जुड़े दो प्रोटोटाइप उड़ान परीक्षणों के चरण तक पहुंचा चुका है। ऐसे में भारतीय वायुसेना वैश्विक स्तर पर चल रहे उन्नत लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में शामिल होकर अपनी भविष्य की युद्धक क्षमता को मजबूत करना चाहती है।
FCAS और GCAP पर भारत की नजर
वर्तमान में दुनिया में छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों से जुड़े कई बड़े कार्यक्रम चल रहे हैं। अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए F-47 कार्यक्रम और अमेरिकी नौसेना के F/A-XX प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है।
वहीं यूरोप में दो प्रमुख परियोजनाएं चर्चा में हैं। पहली फ्रांस, जर्मनी और स्पेन द्वारा विकसित की जा रही फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) और दूसरी ब्रिटेन, जापान तथा इटली की साझेदारी वाली ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP)। भारत इन दोनों परियोजनाओं का गंभीरता से अध्ययन कर रहा है और इनमें से किसी एक में भागीदारी की संभावना तलाश रहा है।
भारतीय वायुसेना ने रक्षा संबंधी संसदीय समिति को औपचारिक रूप से अवगत कराया है कि वह इन अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल होने की इच्छुक है। एयरबस के अनुसार FCAS का प्रोटोटाइप 2028 तक उड़ान भर सकता है, जबकि GCAP का प्रोटोटाइप अगले वर्ष तक सामने आने की संभावना है। हालांकि इन दोनों विमानों के 2030 के दशक के मध्य से पहले सक्रिय सेवा में आने की संभावना कम है।
यूरोपीय परियोजनाओं के सामने चुनौतियां
भारत के लिए विकल्पों का चयन आसान नहीं होगा क्योंकि यूरोपीय परियोजनाओं के भीतर भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। FCAS कार्यक्रम में फ्रांस और जर्मनी के बीच आवश्यकताओं और तकनीकी प्राथमिकताओं को लेकर मतभेद सामने आए हैं। रिपोर्टों के अनुसार एयरबस स्वीडन को संभावित साझेदार के रूप में शामिल करने पर भी विचार कर रही है।
दूसरी ओर, फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट ने संकेत दिया है कि आवश्यकता पड़ने पर वह विमान को स्वतंत्र रूप से विकसित करने का रास्ता अपना सकती है। यह वही रणनीति होगी जिसने पहले राफेल लड़ाकू विमान को जन्म दिया था। ऐसे घटनाक्रम भारत के निर्णय और समयसीमा दोनों को प्रभावित कर सकते हैं।
क्या होंगे छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की विशेषताएं?
छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान वर्तमान पांचवीं पीढ़ी के विमानों से कहीं अधिक उन्नत माने जा रहे हैं। इनमें चारों ओर से कम दृश्यता, डिजिटल आधारित डिजाइन और अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर शामिल होंगे। इन तकनीकों से विमान की जीवित रहने की क्षमता, रखरखाव और युद्धक्षेत्र में प्रभावशीलता बढ़ेगी।
इन विमानों में स्टील्थ डिजाइन, गैलियम-नाइट्राइड आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स और वैरिएबल-साइकिल इंजन जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। इनके हथियारों में लंबी दूरी की मिसाइलें और भविष्य में डायरेक्टेड-एनर्जी आधारित रक्षा प्रणालियां भी शामिल हो सकती हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर युद्ध क्षमताएं और उच्च क्षमता वाले नेटवर्क सिस्टम इन विमानों की सबसे बड़ी विशेषताओं में होंगे। इससे युद्ध के दौरान निर्णय लेने की गति और सटीकता में बड़ा सुधार होगा।
मानव और मशीन का नया तालमेल
छठी पीढ़ी के विमानों में मानव-मशीन इंटरफेस पूरी तरह बदल जाएगा। ये विमान वैकल्पिक रूप से मानवयुक्त होंगे, यानी इन्हें पायलट के साथ, दूरस्थ नियंत्रण से या पूरी तरह AI आधारित मिशनों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।
हेलमेट आधारित वर्चुअल कॉकपिट, 360 डिग्री विजन और AI समर्थित स्थिति जागरूकता प्रणाली पायलटों को युद्धक्षेत्र की व्यापक जानकारी प्रदान करेगी। इससे संचालन क्षमता और सुरक्षा दोनों में सुधार होगा।
AMCA और Su-57 के साथ दोहरी रणनीति
भारत का स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम भी समानांतर रूप से आगे बढ़ रहा है। इसका लक्ष्य भी लगभग उसी समय सेवा में प्रवेश करना है जब दुनिया के कई छठी पीढ़ी के विमान सक्रिय होंगे।
इसके अलावा भारत रूस के साथ Su-57 लड़ाकू विमान को लेकर भी बातचीत कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति भविष्य की जरूरतों और वर्तमान सुरक्षा आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है।
तकनीक हस्तांतरण और रणनीतिक साझेदारी पर रहेगा फोकस
भारत की रक्षा खरीद नीति में तकनीक हस्तांतरण और घरेलू उत्पादन हमेशा प्रमुख प्राथमिकताएं रही हैं। इसलिए FCAS या GCAP में शामिल होने की स्थिति में भारत स्थानीय उत्पादन, भारतीय प्रणालियों के एकीकरण और बौद्धिक संपदा अधिकारों जैसे मुद्दों पर विशेष जोर देगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का अंतिम निर्णय केवल तकनीकी क्षमताओं के आधार पर नहीं होगा, बल्कि उसके रणनीतिक और भू-राजनीतिक हित भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। GCAP में ब्रिटेन और जापान की भागीदारी भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति के अनुरूप मानी जा रही है, जबकि FCAS यूरोप के साथ रक्षा सहयोग को नई दिशा दे सकता है।
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