भारत सरकार अब बैलिस्टिक मिसाइल निर्माण क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यदि यह फैसला लागू होता है, तो यह देश के रक्षा उत्पादन ढांचे में बड़ा बदलाव माना जाएगा, क्योंकि अब तक इस संवेदनशील क्षेत्र पर रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (DPSUs) का लगभग पूर्ण नियंत्रण रहा है।
राजेश कुमार सिंह ने भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) वार्षिक व्यापार शिखर सम्मेलन 2026 में इस संभावित नीति बदलाव का संकेत दिया। उन्होंने कहा कि सरकार निजी क्षेत्र के लिए “लेवल प्लेइंग फील्ड” तैयार करना चाहती है और इसके लिए रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया का मसौदा (DAP) 2026 पर काम चल रहा है।
रक्षा सचिव ने कहा कि आधुनिक युद्ध में बैलिस्टिक मिसाइलों का रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है और अब समय आ गया है कि निजी कंपनियों को भी इस क्षेत्र में तकनीकी भागीदारी और उत्पादन का अवसर दिया जाए।
उन्होंने उद्योग जगत और सैन्य अधिकारियों को भरोसा दिलाया कि सरकार जल्द ही ऐसे कदम उठाएगी जिससे निजी क्षेत्र की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब केंद्र सरकार पहले ही देश के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (AMCA) में निजी कंपनियों की भागीदारी को मंजूरी दे चुकी है। AMCA परियोजना के लिए तीन कंसोर्टियम चुने गए हैं, जिनमें दो सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की साझेदारी वाले हैं, जबकि एक पूरी तरह निजी क्षेत्र का समूह है।
राजेश कुमार सिंह ने बताया कि AMCA कार्यक्रम के लिए जल्द ही प्रस्ताव के लिए अनुरोध (RFP) जारी किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के तहत हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ-साथ एक अतिरिक्त उत्पादन लाइन स्थापित करने की योजना है, जिससे भारत के एयरोस्पेस उद्योग को बड़े पैमाने पर विकसित किया जा सके।
उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य भारत के रक्षा उद्योग को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और तकनीकी रूप से उन्नत बनाना है।
रक्षा सचिव ने “ डिफेंस फोर्सेस विजन 2047” का भी उल्लेख किया और कई महत्वाकांक्षी लक्ष्य सामने रखे। उनके अनुसार, अगले 21 वर्षों तक रक्षा बजट में हर साल 20 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही रक्षा उत्पादन को 8.8 लाख करोड़ रुपये और रक्षा निर्यात को 2.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने की योजना है।
उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर, अग्रणी और अतुल्य भारत 2047 का विजन भारत को दुनिया के शीर्ष तीन रक्षा निर्यातकों में शामिल करने की दिशा में तैयार किया गया है। राजेश कुमार सिंह ने बताया कि पिछले डेढ़ वर्ष में उद्योग जगत को 4.5 लाख करोड़ रुपये की रक्षा परियोजनाएं दी गई हैं। इनमें 70 प्रतिशत मूल्य और 90 प्रतिशत कॉन्ट्रैक्ट स्वदेशी कंपनियों को मिले हैं।
उन्होंने उद्योग जगत से अपील की कि कंपनियां आपसी शिकायतों और विवादों से बचें, क्योंकि इससे रक्षा खरीद प्रक्रियाओं में देरी होती है। उन्होंने समयसीमा के भीतर परियोजनाएं पूरी करने के महत्व पर भी जोर दिया।
रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि सरकार कम विकसित देशों को रक्षा निर्यात बढ़ाने के लिए नई लाइन ऑफ़ क्रेडिट (LoC) योजना पर काम कर रही है। इसका उद्देश्य वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की मौजूदगी को मजबूत करना है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 62.66 प्रतिशत अधिक है। इन निर्यातों में DPSU का योगदान 54.84 प्रतिशत रहा, जबकि निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 45.16 प्रतिशत तक पहुंच गई। विशेषज्ञ इसे भारत के रक्षा उद्योग में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका का बड़ा संकेत मान रहे हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि बैलिस्टिक मिसाइल निर्माण और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में निजी क्षेत्र की भागीदारी भारत के रक्षा औद्योगिक ढांचे में ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकती है। सरकार इसे आत्मनिर्भरता, रणनीतिक मजबूती और वैश्विक रक्षा प्रतिस्पर्धा की दिशा में बड़ा कदम मान रही है।
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