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Friday, October 30, 2026
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पुणे फर्जी रेप केस: इंसाफ और कानून के दुरुपयोग पर उठ रहें सवाल!

झूठी शिकायतों से असली पीड़ितों को हो रहा है नुकसान

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पुणे से सामने आई एक चौंकाने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। एक 22 वर्षीय टेक प्रोफेशनल महिला द्वारा दर्ज कराया गया दुष्कर्म का मामला पूरी तरह से झूठा निकला। शुरुआत में युवती ने दावा किया था कि एक डिलीवरी एजेंट ने उसके घर में घुसकर केमिकल स्प्रे का उपयोग कर उसे बेहोश किया, फिर दुष्कर्म कर उसकी तस्वीरें खींची और उन्हें वायरल करने की धमकी दी। लेकिन जब पुलिस ने इस मामले की गहराई से जांच की, तो पूरा सच सामने आ गया।

पुलिस जांच में बड़ा खुलासा:

पुणे के पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार के अनुसार, किसी भी डिलीवरी एजेंट की उपस्थिति की पुष्टि नहीं हुई। घटनास्थल पर जबरन प्रवेश या केमिकल के प्रयोग का कोई प्रमाण नहीं मिला। जांच में सामने आया कि युवती के फ्लैट में जो युवक आया था, वह उसका मित्र था और सब कुछ आपसी सहमति से हुआ था। इतना ही नहीं, कथित धमकी वाला मैसेज भी उसी युवती ने स्वयं टाइप किया था, जब युवक 2 जुलाई को उसके घर से जा चुका था। युवती ने बाद में अपने मानसिक अस्थिरता की बात कही, जिसकी अब मेडिकल जांच की जा रही है।

पुरुष अधिकार कार्यकर्ता दीपिका भारद्वाज ने इस मामले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि, “भारत में रेप एक गंभीर अपराध है, जिसमें आरोपी को तुरंत जेल भेजा जाता है। लेकिन यदि शिकायत झूठी निकलती है, तो उस महिला के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।” उन्होंने आगे कहा कि इस युवती ने शिक्षित होते हुए और प्रोफेसर से सलाह लेने के बाद यह झूठी कहानी रची, जो यह साबित करता है कि मामला सोच-समझकर गढ़ा गया था।

भारतीया न्याय संहिता (BNS) की धारा 248 और 217 के तहत झूठा आरोप लगाना और सरकारी कर्मचारी को गुमराह करना खुद एक दंडनीय अपराध है। कार्यकर्ता शैनी कपूर का कहना है कि ऐसे मामलों में पुलिस स्वयं या पीड़ित युवक झूठे आरोप के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकते हैं। उन्होंने अपने RTI डेटा के हवाले से बताया कि दिल्ली में बलात्कार मामलों में सजा की दर केवल 4.3% है, और 40% मामलों में महिलाएं बाद में अपना बयान वापस ले लेती हैं।

इस घटना से पहले फरवरी 2025 में भी पुणे के स्वारगेट बस डिपो में एक शिवशाही बस के अंदर दुष्कर्म का आरोप लगा था। उस मामले में भी आरोपी ने सहमति से संबंध की बात कही थी। वह मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन दोनों मामलों ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या “रेप” जैसे संवेदनशील मामलों का झूठा उपयोग एक खतरनाक ट्रेंड बनता जा रहा है?

भारत में जहां बलात्कार के असली मामलों को सख्त कानून और सामाजिक समर्थन की जरूरत है, वहीं झूठे मामलों से पूरे सिस्टम की साख पर सवाल उठते हैं। ये मामले न केवल पुलिस संसाधनों का दुरुपयोग करते हैं बल्कि असली पीड़ितों को न्याय दिलाने की राह भी कठिन बना देते हैं। यदि समाज और न्याय प्रणाली को संतुलन में रखना है, तो जरूरी है कि झूठे मामलों में भी उतनी ही सख्ती दिखाई जाए जितनी सच्चे मामलों में अपराधियों के खिलाफ दिखाई जाती है। वरना ‘कानून का हथियार’ एक दिन कानून का मज़ाक बन जाएगा।

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