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Sunday, January 25, 2026
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तेलंगाना की ओर बढ़ी मायावती, केसीआर और कांग्रेस में  बेचैनी क्यों ? 

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तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर की पार्टी भारत राष्ट्र समिति महाराष्ट्र में पैर पसारने की कोशिश कर रही है। पिछले दिनों महाराष्ट्र में पार्टी कार्यालय का उद्घाटन किया। इसी तर्ज पर  केसीआर और कांग्रेस की मायावती ने टेंशन बड़ा दी है। मायावती की बहुजन समाज  पार्टी तेलंगाना में विस्तार की तैयारी में है। जिससे कांग्रेस और केसीआर की बेचैनी बढ़ गई है। जानकारों का कहना है कि मायावती का इस तरह से दक्षिण के राज्यों में विस्तार अचानक नहीं हुआ है। बल्कि इसके पीछे सोची समझी रणनीति है। मायावती, कांग्रेस और केसीआर के वोटों में सेंध लगा सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि मायावती के इस कदम से किसे फ़ायदा होगा किसे नुकसान होगा।

दरअसल मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मायावती तेलंगाना में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति की धड़कनें बड़ा सकती हैं। बताया जा रहा है कि मायावती दक्षिण के राज्यों में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों में पैठ बनाने की कोशिश में हैं। मायावती इसकी शुरुआत तेलंगाना से करने वाली है। मायावती के इस कदम से कांग्रेस में खलबली मची हुई है। कांग्रेस को शक है कि मायावती के इस रणनीति के पीछे बीजेपी है। हालांकि,इससे पहले भी मायावती तेलंगाना के मुख्यमंत्री को घेरती रही हैं। उन्होंने बिहार के बाहुबली आनंद मोहन की रिहाई पर केसीआर की चुप्पी पर सवाल उठा चुकी हैं। उन्होंने  मई माह में कहा था कि तेलंगाना के आईएएस अधिकारी की बिहार में हत्या करने वाले को राज्य सरकार रिहा करती है, तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री इस संबंध में एक शब्द नहीं बोलते हैं।

बता दें कि इसी साल 14 अप्रैल को सीएम केसीआर ने राज्य में 125 फीट की बाबा साहेब आंबेडकर की मूर्ति का अनावरण किया था। इस कार्यक्रम में बाबा साहेब आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर भी शामिल हुए थे। इसके बाद से ही सवाल उठने लगे थे कि आखिर केसीआर का बाबा साहेब आंबेडकर पर इतना प्रेम क्यों उमड़ रहा है। इसकी क्या वजह हो सकती है। तो बताया जा रहा है केसीआर तेलंगाना के सत्ता में दोबारा वापसी के मकसद से यह कदम उठाया है। दरअसल, तेलंगाना के 33 में से नौ जिलों में 20 प्रतिशत दलितों की आबादी निवास करती है।  ये दलित वोट सत्ता तक पहुंचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में केसीआर को डर है कि यह वोट छिटक न जाए।

वैसे बात इतनी भी आसान नहीं है। बल्कि इसका राज भी बहुत गहरा है। बताया जा रहा है कि  बहुजन समाज पार्टी की राज्य में कमान संभाल रहे आर एस प्रवीण की लोकप्रियता बढ़ रही है। दरअसल प्रवीण पूर्व आईएएस हैं। उन्होंने अपने नौकरी के दौरान एक संगठन बनाया था।  जिससे कई हजार दलित समुदाय जुड़ा हुआ है। प्रवीण राज्य में दलितों और पिछड़े बच्चों के लिए बहुत काम किया है। बीते माह मायावती ने तेलंगाना में प्रवीण को सीएम उम्मीदवार घोषित किया था। बताया जा रहा है कि प्रवीण को तेलंगाना में दलितों और पिछड़ों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। जिससे केसीआर ही नहीं कांग्रेस भी डरी हुई है।

बताया जा रहा है कि केसीआर द्वारा राज्य में दलित बंधू योजना लांच करने के पीछे दलितों को अपने पाले में करना है। ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में भारी वोट हासिल किया जा सके। इस योजना को 2021 में राज्य में लांच किया गया था। इस योजना के तहत दलित परिवार को दस लाख रुपया बिना ब्याज का दिया जाता है। जिससे यह परिवार अपना कोई व्यवसाय शुरू कर सकता है। हालांकि इस योजना का लाभ केसीआर को मिलेगा की नहीं यह चुनाव बाद ही पता चलेगा। वहीं, कांग्रेस भी मायावती के तेलंगाना में चुनाव लड़ने की तैयारी बौखला गई है। क्योंकि, तेलंगाना में कांग्रेस और केसीआर के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। केसीआर ने लोकसभा चुनाव में न बीजेपी के साथ जाने को तैयार हैं और न ही कांग्रेस के साथ। वे नीतीश कुमार से मिलकर तीसरा मोर्चा बनाने की वकालत कर चुके हैं। लेकिन नीतीश कुमार इसे नकार चुके हैं। वे हर हाल में कांग्रेस को साथ रखना चाहते हैं।

ऐसे में माना जा रहा है कि तेलंगाना विधानसभा चुनाव के दौरान केसीआर , मायावती और कांग्रेस दोनों दल दलितों और पिछड़ों की राजनीति करते नजर आ सकते हैं। कांग्रेस भी तेलंगाना में कर्नाटक जैसी योजनाओं की घोषणा कर सकती है। कांग्रेस दलित और पिछड़े वोटों को अपने पाले में रखने की भरकस प्रयास करती रही है। गौरतलब है कि आंबेडकर जयंती पर जब केसीआर ने बाबा साहेब आंबेडकर की 125 फीट की मूर्ति का अनावरण कार्यक्रम रखा था। उसी दिन हैदराबाद में मल्लिकार्जुन खड़गे ने कार्यक्रम आयोजित किया था। इन तमाम  रस्साकसी के बावजूद देखना होगा कि दलित और पिछड़ा वोट किधर जाता है।

वहीं कहा जा रहा है कि मायावती की तेलंगाना में एंट्री के पीछे बीजेपी है। राजनीति जानकारों का मानना है कि मायावती का तेलंगाना में आने का मकसद दो हो सकता है। पहला यह कि वह कांग्रेस का वोट काट सके। दूसरा यह कि चुनाव केवल कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति न रह जाए। ऐसे में यह साफ़ है कि इस लड़ाई में फ़ायदा बीजेपी को होना तय है। वैसे कांग्रेस कुछ भी कहे लेकिन कई राज्यों में उसकी स्थिति बहुत ही कमजोर है। कांग्रेस भले कर्नाटक में जीत दर्ज की हो लेकिन कई राज्यों में कांग्रेस संगठन मजबूत नहीं है। यही वजह है कि क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को आंख दिखा रही है। तो देखना होगा कि इस साल तेलंगाना चुनाव में दलित वोट  किधर जाता है। क्या मायावती अपने पारंपरिक वोट से तेलंगाना में कोई करिश्मा दिखाएंगी ? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
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