अधिसूचना के तहत जवालागिरी-उलिबांडा-थग्गाट्टी, जवालागिरी-पनाई-अंचेट्टी और बिल्लिकल-जवालागिरी पहचाने गए कॉरिडोर हैं। यह आदेश पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव ककरला उषा ने जारी किया।
जवालागिरी-उलिबांडा-थगट्टी कॉरिडोर 18.50 किलोमीटर के दायरे में 3,241.53 हेक्टेयर जमीन को कवर करता है। सबसे छोटा कॉरिडोर बिलिक्कल-जवालागिरी, 2.20 किलोमीटर लंबा है और लगभग 196 हेक्टेयर जमीन को कवर करता है।
राज्य सरकार को ‘प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स’ और ‘चीफ़ वाइल्डलाइफ वॉर्डन’ की ओर से सौंपी गई एक रिपोर्ट में इन तीनों रास्तों को हाथियों की मौसमी आवाजाही के लिए अहम बताया गया है। ये कॉरिडोर तमिलनाडु-कर्नाटक सीमा पर अहम इकोलॉजिकल लिंक बनाते हैं। हाथियों के झुंड मानसून के पैटर्न, पानी और चारे की उपलब्धता में बदलाव, प्रजनन की जरूरतों और रहने की दूसरी स्थितियों के आधार पर नियमित रूप से इन दोनों राज्यों के बीच आते-जाते रहते हैं।
इसलिए, हाथियों की आबादी को बनाए रखने और टुकड़ों में बंटे उनके रहने की जगहों पर दबाव कम करने के लिए इन पारंपरिक रास्तों को बचाना जरूरी माना जाता है। चूंकि ये तीनों कॉरिडोर पहले से ही रिजर्व फॉरेस्ट या सुरक्षित अभयारण्य इलाकों में आते हैं, इसलिए इस नोटिफिकेशन से जमीन के कानूनी वर्गीकरण में कोई बदलाव नहीं होगा। इससे स्थानीय लोगों पर कोई अतिरिक्त पाबंदी भी नहीं लगेगी, क्योंकि ये इलाके पहले से ही रिजर्व फॉरेस्ट या वन्यजीव संरक्षण नियमों के तहत आते हैं।
हालांकि, औपचारिक मान्यता मिलने से इन कॉरिडोर को संरक्षण के मामले में ज्यादा प्राथमिकता मिलने, वन अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल होने और भविष्य में विकास कार्यों या रहने की जगहों में रुकावट के कारण हाथियों की आवाजाही बाधित होने से रोकने में मदद मिलने की उम्मीद है।
इससे लंबे समय की लैंडस्केप प्लानिंग, वन्यजीवों की निगरानी और माइग्रेशन रूट के पास की बस्तियों में इंसान और हाथी के बीच टकराव को कम करने के उपायों में भी मदद मिल सकती है, साथ ही इन रास्तों पर खराब हो चुके हिस्सों को ठीक करने के लिए खास कोशिशों को भी दिशा मिल सकती है। यह नोटिफिकेशन तमिलनाडु सरकार के राजपत्र (गजट) और कृष्णगिरि जिले के राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा, जिससे औपचारिक मान्यता की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।



