बांग्लादेश में एक लंबे समय से चली आ रही कानूनी लड़ाई ने बुधवार को नया मोड़ लिया, जब हाईकोर्ट ने हिंदू संत और सामाजिक कार्यकर्ता चिन्मय कृष्ण दास को देशद्रोह के मामले में जमानत दे दी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह राहत उनकी जेल से रिहाई का रास्ता खोल पाएगी, या फिर सुप्रीम कोर्ट की रोक सब कुछ फिर उलझा देगी?
चिन्मय कृष्ण दास, जिनका नाम बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की आवाज के रूप में जाना जाता है, को पिछले साल चटगांव में राष्ट्रीय ध्वज के अपमान के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। यह आरोप चटगांव के मोहोरा वार्ड के बीएनपी नेता फिरोज खान द्वारा दर्ज कराया गया था, जिसमें 18 अन्य लोगों के साथ चिन्मय को भी आरोपी बनाया गया। आरोप था कि 25 अक्टूबर को हिंदू समुदाय की एक रैली के दौरान राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान किया गया।
हालांकि इस मामले की राजनीतिक और सांप्रदायिक पृष्ठभूमि को नज़रअंदाज़ करना कठिन है। गिरफ्तारी के बाद चिन्मय की जमानत याचिका एक स्थानीय अदालत ने खारिज कर दी और 26 नवंबर को उन्हें जेल भेज दिया गया। इस गिरफ्तारी के खिलाफ बांग्लादेश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। देशभर में अल्पसंख्यकों के समर्थन में आवाज़ें उठीं और उनकी तत्काल रिहाई की मांग की गई।
अब, बांग्लादेश हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ—जस्टिस मोहम्मद अताउर रहमान और जस्टिस मोहम्मद अली रजा—ने चिन्मय की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें जमानत दी है। उनके वकील प्रोलाद देब नाथ के मुताबिक, अगर सुप्रीम कोर्ट इस आदेश पर रोक नहीं लगाता, तो चिन्मय की रिहाई संभव है।
गौरतलब है कि चिन्मय कृष्ण दास सिर्फ एक धार्मिक संत नहीं, बल्कि एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं, जिन्होंने अल्पसंख्यक संरक्षण कानून, त्वरित न्यायाधिकरण और एक समर्पित मंत्रालय की मांग के जरिए बांग्लादेश के संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है।
दूसरी ओर, मोहम्मद यूनुस की अगुआई वाली अंतरिम सरकार पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वह धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रही है। खासकर पिछले साल अगस्त में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से देश में अल्पसंख्यकों पर हमलों में इज़ाफा हुआ है।
भारत भी इस घटनाक्रम पर कड़ी निगाह रखे हुए है। नई दिल्ली ने ढाका से बार-बार अपील की है कि बांग्लादेश सरकार सभी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के अपने दायित्व को गंभीरता से निभाए। चिन्मय कृष्ण दास की रिहाई को लेकर जनता की उम्मीदें बनी हुई हैं। लेकिन सवाल अब भी वही है—क्या जमानत के बाद सचमुच खुलेगा जेल का फाटक? या फिर राजनीति की साज़िशें न्याय के रास्ते में दीवार बनी रहेंगी?
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