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Friday, May 15, 2026
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इनफिनिट स्क्रॉल और ऑटो-प्ले से बच्चे स्क्रीन के आदी बनते जा रहे!

यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल चिल्ड्रेंस इमरजेंसी फंड (यूनिसेफ) इस बारे में डिजिटल पेरेंटिंग एक्सपर्ट डॉ. जैकलीन नेसी के हवाले से विस्तार से जानकारी देता है।

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आजकल के समय में मोबाइल फोन एक बड़ी जरूरत बन चुका है लेकिन परेशानी तब आती है, जब कम उम्र में इसकी जद में बच्चे व युवा पीढ़ी आ जाती है। कड़वी सच्चाई है कि बच्चों को फोन से अलग करना मुश्किल हो गया है। वे घंटों स्क्रॉल करते रहते हैं। क्या आप जानते हैं कि यह कोई संयोग नहीं है? सोशल मीडिया ऐप्स को जानबूझकर ऐसे डिजाइन किया गया है कि बच्चे लगातार उन पर बने रहें।

यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल चिल्ड्रेंस इमरजेंसी फंड (यूनिसेफ) इस बारे में डिजिटल पेरेंटिंग एक्सपर्ट डॉ. जैकलीन नेसी के हवाले से विस्तार से जानकारी देता है। डॉ. जैकलीन नेसी बताती हैं कि सोशल मीडिया कंपनियां कई खास फीचर्स का इस्तेमाल करती हैं, जो बच्चों और बड़ों को स्क्रीन से चिपकाए रखते हैं।

इनमें सबसे आम हैं इनफिनिट स्क्रॉल यानी ऐसी फीड जो कभी खत्म नहीं होती, ऑटो-प्ले मतलब कि वीडियो अपने आप चलते रहते हैं और नोटिफिकेशन, लाइक्स, व्यूज और स्ट्रीक्स जैसी गिनती वाले फीचर्स। इनकी वजह से बच्चे बार-बार ऐप खोलते रहते हैं और समय का पता ही नहीं चलता।

एक्सपर्ट बताते हैं कि सोशल मीडिया का एल्गोरिदम बहुत चालाक तरीके से काम करता है। यह देखता है कि आप कौन से वीडियो ज्यादा देर तक देखते हैं, कौन सी पोस्ट पर रुकते हैं। फिर उसी तरह का और ज्यादा कंटेंट आपके सामने लाता है। इसका मकसद सिर्फ एक है- आप जितना ज्यादा समय प्लेटफॉर्म पर बिताएं, उतना बेहतर। हालांकि, ये एल्गोरिदम बच्चों की भलाई को ध्यान में रखकर नहीं बनाए जाते, बल्कि उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए बनाए जाते हैं।

अब सवाल है कि बच्चे इसमें क्यों ज्यादा फंस जाते हैं? तो एक्सपर्ट बताते हैं कि बच्चों और किशोरों का दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है। उनमें खुद पर कंट्रोल करने की क्षमता पूरी तरह नहीं आई होती। वे सोशल रिवार्ड्स जैसे लाइक्स और कमेंट्स के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। अगर दोस्त सोशल मीडिया पर एक-दूसरे से बात कर रहे हैं और बच्चा उसमें शामिल नहीं है तो उसे अकेलापन महसूस होता है। इसलिए वे ऐप छोड़ पाने में मुश्किल महसूस करते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर इसका गहरा असर पड़ता है। सोशल मीडिया का असर हर बच्चे पर अलग-अलग होता है। कुछ बच्चे जो पहले से भावनात्मक रूप से संवेदनशील हैं, उन्हें ज्यादा नुकसान हो सकता है। वहीं, कुछ बच्चे सही मार्गदर्शन के साथ इसका सकारात्मक इस्तेमाल भी कर सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि सोशल मीडिया नींद, खेलकूद, पढ़ाई और असली जीवन के रिश्तों की जगह लेने लगता है।

अगर बच्चा सोशल मीडिया की वजह से नींद नहीं ले पा रहा, होमवर्क अधूरा छोड़ रहा, परिवार के साथ समय नहीं बिता रहा या स्कूल में ध्यान नहीं दे पा रहा है, तो यह चिंता की बात है।

ऐसे में डॉ. जैकलीन नेसी माता-पिता को तीन मुख्य सुझाव देती हैं- पहला खुलकर बात करें – बच्चे से बिना डांटे पूछें कि उन्हें सोशल मीडिया पर इतना समय क्यों बिताना अच्छा लगता है। इन ऐप्स के डिजाइन ट्रिक्स के बारे में भी समझाएं। दूसरा है सीमाएं तय करें – स्क्रीन टाइम की लिमिट रखें और परिवार के साथ समय बिताने को प्राथमिकता दें। तीसरा है रोल मॉडल बनें यानी खुद भी फोन का संतुलित इस्तेमाल करें।

एक्सपर्ट का मानना है कि सोशल मीडिया पूरी तरह से बुरा नहीं है, लेकिन इसके इस्तेमाल पर नजर रखना जरूरी है। इसमें माता-पिता को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ताकि बच्चे स्वस्थ और संतुलित जीवन जी सकें।

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