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विलय और विस्तार सौदों का असर! भारत में ट्रांजैक्शनल रिस्क इंश्योरेंस की मांग बढ़ी!

रिपोर्ट में आगे कहा गया कि भारत में भी डील का आकार तेजी से बढ़ रहा है और नियामकीय जांच-पड़ताल ने संरचित जोखिम समाधानों की मांग को तेज कर दिया।

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बीते वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर विलय और विस्तार सौदों में बढ़ोतरी के कारण भारतीय कंपनियां की ओर से ट्रांजैक्शनल रिस्क इंश्योरेंस की मांग में बढ़ोतरी देखने को मिली है। इसकी वजह सौदों के पूरे होने और क्रियान्वयन से जुड़ी रिस्क है। यह जानकारी बुधवार को जारी रिपोर्ट में दी गई।

मार्श की रिपोर्ट में कहा गया है कि विलय और अधिग्रहण सौदों का मूल्य वैश्विक स्तर पर सालाना आधार पर लगभग 37 प्रतिशत बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुंच गया है, जिसमें बड़े सौदों की संख्या में तेज बढ़ोतरी हुई है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया कि भारत में भी डील का आकार तेजी से बढ़ रहा है और नियामकीय जांच-पड़ताल ने संरचित जोखिम समाधानों की मांग को तेज कर दिया।

मार्श इंडिया के सीईओ और प्रेसिडेंट संजय केडिया ने कहा, “जैसे-जैसे भारत खुद को एक वैश्विक निवेश केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है, लेनदेन से संबंधित जोखिमों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने की क्षमता महत्वपूर्ण होगी।”

उन्होंने आगे कहा,”भारतीय डीलमेकर्स के बीच लेन-देन संबंधी जोखिम समाधानों के प्रति जागरूकता   बढ़ रही है, खासकर सीमा पार लेन-देन और नियामक जटिलताओं में वृद्धि के कारण। यह ट्रेंड 2026 में और भी तेज होने की उम्मीद है क्योंकि कंपनियां डील के एग्जीक्यूशन में अधिक लचीलापन और आत्मविश्वास चाहते हैं।”

रिपोर्ट में ग्लोबल ट्रांजैक्शनल रिस्क इंश्योरेंस लिमिट्स में 34 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो बढ़कर 91.6 अरब डॉलर हो गई है। साथ ही, पॉलिसी की मात्रा में 37 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो सौदेबाजी के एक प्रमुख घटक के रूप में इंश्योरेंस की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है।

भारत में निजी इक्विटी और रणनीतिक कॉर्पोरेट लेनदेन, दोनों में ट्रांजैक्शनल रिस्क इंश्योरेंस का प्रचलन बढ़ रहा है, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, अवसंरचना और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में, जहां सौदों का आकार और नियामक संबंधी विचार अधिक गहन हो रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बड़े और अधिक जटिल सौदे इंश्योरेंस और बहुस्तरीय कवरेज संरचनाओं की मांग को बढ़ा रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर इंश्योर्ड लेनदेन में कॉर्पोरेट खरीदारों की हिस्सेदारी अब अधिक (54 प्रतिशत) है, और रणनीतिक अधिग्रहणों के कारण भारत में भी यह बदलाव तेजी से दिखाई दे रहा है।

फर्म ने कहा कि वैश्विक स्तर पर दावों की आवृत्ति और गंभीरता बढ़ रही है, जो एक परिपक्व बाजार का संकेत है और प्रारंभिक सहभागिता और मजबूत सौदा संरचना की आवश्यकता को बल देती है।

इसके अलावा, मूल्य निर्धारण के रुझान में बदलाव आया है, जिसमें एशिया सहित सभी क्षेत्रों में प्रीमियम दरों में वृद्धि हुई है (पिछले वर्ष की तुलना में 8 प्रतिशत की वृद्धि), जो अधिक अनुशासित अंडरराइटिंग वातावरण की ओर संक्रमण का संकेत है।

रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि मजबूत घरेलू आधार, निवेशकों के विश्वास और बढ़ती सीमा पार रुचि के समर्थन से भारत विलय एवं अधिग्रहण के लिए एक प्रमुख विकास बाजार बना रहेगा।

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