​ईरान-इस्राइल युद्ध: भारत ने तनाव में अपनाई रणनीति, रूस से तेल बढ़ाया​!

भारत ने जून महीने में रूस से इतना तेल खरीदा है, जो पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों से खरीदे गए कुल कच्चे तेल से भी ज्यादा है।

​ईरान-इस्राइल युद्ध: भारत ने तनाव में अपनाई रणनीति, रूस से तेल बढ़ाया​!

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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-इस्राइल युद्ध में अमेरिका के शामिल होने के बाद वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ने लगी है। जानकारों का मानना है कि इस भू-राजनीतिक संकट का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ेगा। संभावित मूल्यवृद्धि से पहले ही भारत ने अपनी ऊर्जा आयात रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चे तेल का आयात शुरू कर दिया है।
रविवार तड़के अमेरिका ने ईरान के तीन परमाणु ठिकानों​-फोर्डो, नतांज और इस्फहान​-पर बमबारी कर दी। जवाब में ईरान ने पलटवार की चेतावनी दी और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाज़ों पर हमले का संकेत दिया। यह जलडमरूमध्य भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का करीब 40% तेल आयात इसी मार्ग से होकर आता है।

जून में रूस से आयात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी​: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत ने पहले ही जून माह से रूस और अमेरिका से कच्चे तेल का आयात तेज कर दिया है। वैश्विक व्यापार विश्लेषक फर्म कैपलर के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने जून 2025 में रूस से 20–22 लाख बैरल प्रतिदिन की दर से कच्चे तेल की खरीद की, जो पिछले दो वर्षों में सबसे अधिक है।

मई 2025 में यह आंकड़ा करीब 11 लाख बैरल प्रतिदिन था,यानी मात्र एक महीने में लगभग दोगुना आयात दर्ज हुआ है।इससे स्पष्ट है कि भारत ने पश्चिम एशिया से संभावित आपूर्ति बाधाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति तैयार की है।

खाड़ी देशों की निर्भरता में कमी​: पारंपरिक रूप से भारत का अधिकतर कच्चा तेल इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आता रहा है। जून में इन देशों से भारत ने कुल मिलाकर 20 लाख बैरल प्रतिदिन का आयात किया। लेकिन यह आंकड़ा अब रूस से हुए आयात से कम है।

यह पहली बार है जब भारत ने खाड़ी देशों की तुलना में रूस से ज्यादा तेल मंगाया है। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि भारत अब अपने कुल कच्चे तेल आयात का 40-44% रूस से प्राप्त कर रहा है, जबकि युद्ध से पहले यह हिस्सा मात्र 1% था।

होर्मुज जलडमरूमध्य बना नई चिंता का केंद्र​: ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका इस्राइल के साथ उसके युद्ध में सक्रिय रहता है, तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारी जहाजों को निशाना बनाएगा। यह मार्ग भारत और एशिया के कई अन्य देशों के लिए ऊर्जा आयात की जीवनरेखा माना जाता है।

इसके अलावा, यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाए जाने की आशंका भी बनी हुई है। ऐसे में भारत ने जोखिम को घटाने के लिए सप्लाई डाइवर्सिफिकेशन पर बल दिया है।

अमेरिका से भी बढ़ाया गया तेल आयात​: रूस के साथ-साथ भारत ने जून में अमेरिका से भी 4.39 लाख बैरल प्रतिदिन के हिसाब से कच्चा तेल खरीदा है, जबकि यह आंकड़ा मई में 2.80 लाख बैरल प्रतिदिन था। हालांकि अमेरिकी तेल महंगा है, लेकिन रणनीतिक सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए भारत अब अमेरिका, लैटिन अमेरिकी देशों और अफ्रीका से भी आयात बढ़ा रहा है।

भारत की रणनीतिक तैयारी​: भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है, हर दिन औसतन 51 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता है। इन आपूर्तियों से देश की रिफाइनरियों में पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। सरकार और रिफाइनिंग कंपनियां वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी बाधा से निपटने के लिए अब बहुस्तरीय रणनीति अपना रही हैं।

ईरान-इस्राइल युद्ध में अमेरिका की सक्रियता ने हालात को विस्फोटक बना दिया है। लेकिन भारत ने समय रहते अपनी ऊर्जा रणनीति में लचीलापन दिखाया है। रूस से सस्ते दर पर तेल खरीद और खाड़ी पर निर्भरता घटाना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम है। भविष्य में यदि होर्मुज या लाल सागर मार्ग बाधित होते हैं, तो भी भारत के पास वैकल्पिक आपूर्ति चैन मौजूद होगी​-यही नीति भारत को तेल संकट से बचा सकती है।
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