पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को लेकर एक नया विवाद भड़क गया है। पाकिस्तानी पत्रकार ने खुलासा किया है कि गाज़ा में तैनाती के लिए पाकिस्तान की ओर से इज़राइल से प्रति सैनिक 10,000 डॉलर की मांग की गई। यह खुलासा इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि इसे मानवीय सहायता के नाम पर एक अंतरराष्ट्रीय शांति बल (ISF) के गठन से जोड़कर देखा जा रहा है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान की सेना का यह कदम सिद्धांतों पर आधारित है या फिर सीधे-सीधे आर्थिक सौदेबाज़ी?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा पेश किए गए 20-सूत्रीय शांति प्रस्ताव में यह व्यवस्था शामिल थी कि गाज़ा में तुरंत एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (ISF) तैनात किया जाए। इस बल का काम होना था, फ़िलिस्तीनी पुलिस बल को प्रशिक्षित करना, इज़राइल और मिस्र के साथ सीमा सुरक्षा सुनिश्चित करना, हथियारों की तस्करी रोकना और गाज़ा में पुनर्निर्माण के लिए संयोजित आपूर्ति सुनिश्चित करना। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बल में अमेरिकी सैनिक शामिल नहीं होंगे, बल्कि इसमें अरब और अन्य अंतरराष्ट्रीय साझेदार देशों की सेनाएँ होंगी।
अक्टूबर के अंत में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था, “अगर पाकिस्तान को इसमें भाग लेना पड़े, तो यह हमारे लिए गर्व की बात होगी। हम इसे सम्मान का विषय मानेंगे।” रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान 20,000 सैनिक गाज़ा भेजने को तैयार था। इसी दौरान, सेना प्रमुख असीम मुनीर की मोसाद (इज़राइल की खुफिया एजेंसी) और CIA के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ गुप्त बैठकों की भी खबर सामने आई।
यही वह मोड़ है जहां विवाद शुरू हुआ। पत्रकार का दावा है कि पाकिस्तान ने गाज़ा में तैनाती के बदले प्रति सैनिक 10,000 डॉलर की मांग की है। यदि यह सच है, तो इसका मतलब यह होगा कि पाकिस्तानी सेना की यह तैनाती मानवीय सहायता नहीं, बल्कि सीधे-सीधे सैन्य किराए पर उपलब्ध कराने से जुड़ी है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तानी सैनिकों का मुख्य काम होगा, हमास के बचे हुए लड़ाकों को निष्क्रिय करना, क्षेत्र को स्थिर करना, इज़राइल और फिलिस्तीनी गुटों के बीच एक सुरक्षा बफर ज़ोन बनाना। यह पाकिस्तान और इज़राइल के बीच पहली अप्रत्यक्ष सुरक्षा साझेदारी मानी जा रही है, जबकि पाकिस्तान इज़राइल को आधिकारिक रूप से मान्यता भी नहीं देता।
यह घटना पाकिस्तान की विदेश नीति, इस्लामी दुनिया में उसकी छवि, और उसकी सेना की व्यावसायिक भूमिका, तीनों पर सवाल उठाती है। क्या पाकिस्तानी सेना शांति सैनिक है? पाकिस्तानी सेना के मानव अधिकार बहाली का इतिहास आखिर क्या कहता है? क्या पाकिस्तानी राष्ट्र के सैन्य संसाधन एक ‘बाज़ार’ में बिकने वाला सौदा बन चुके हैं? विवाद बढ़ रहा है। पाकिस्तान सरकार और सेना ने अभी तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया है।
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