पिछले कई महीनों से यह देखा जा रहा है कि विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय बाजार से लगातार पूंजी निकाल रहे हैं। एक उद्यमी के रूप में आर्थिक मोर्चे पर तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं दिखती। इसके पीछे मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव है। रुपया कमजोर हो रहा है, कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में उछाल के कारण महंगाई बढ़ी है और इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। ऐसे समय में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिनके सकारात्मक परिणाम आने वाले समय में देखने को मिल सकते हैं।
भूराजनीतिक तनावों के कारण वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता चरम पर पहुंच गई है। RBI के नए गवर्नर संजय मल्होत्रा इन सभी परिस्थितियों पर बेहद सतर्क नजर बनाए हुए हैं। बॉन्ड मार्केट (रोखे बाजार) के लिए घोषित नई नीतियां इसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम हैं। शेयर बाजार से लंबे समय से जुड़े एक निवेशक और उद्यमी के रूप में मैं इन बदलावों को बहुत बारीकी से देख रहा हूं। हाल ही में घोषित नीतियों में बॉन्ड मार्केट और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII/FPI) से जुड़े जो साहसिक निर्णय लिए गए हैं, वे भारतीय कॉर्पोरेट जगत और अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाले साबित हो सकते हैं।
भारत में 15, 30 और 40 वर्ष की अवधि के लिए निवेश करने वाली विदेशी वित्तीय संस्थाओं को ब्याज आय पर आयकर से छूट दी गई है। साथ ही, उन्हें दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर (LTCG) से भी राहत प्रदान की गई है। संजय मल्होत्रा एक अनुभवी प्रशासक और दूरदर्शी नीति-निर्माता माने जाते हैं। एक आईएएस अधिकारी के रूप में उनका लंबा अनुभव और वित्त मंत्रालय में उनकी सफल भूमिका उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है। राजस्व विभाग में लंबे समय तक कार्य करने के बाद RBI गवर्नर का पद संभालते हुए उन्होंने केवल महंगाई नियंत्रण पर ही नहीं, बल्कि भारतीय वित्तीय बाजारों को अधिक पारदर्शी और मजबूत बनाने पर भी विशेष जोर दिया है।
वित्त वर्ष 2025-26 की अंतिम तिमाही में भारत ने 7.8 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर दर्ज की, जबकि पूरे वर्ष की विकास दर 7.7 प्रतिशत रही। वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितताओं के बावजूद यह प्रदर्शन सराहनीय है। इसमें RBI की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। महंगाई को निर्धारित दायरे में बनाए रखने के लिए भी केंद्रीय बैंक की प्रशंसा की जानी चाहिए।
कॉर्पोरेट जगत के दृष्टिकोण से देखें तो गवर्नर मल्होत्रा ने विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव कम करने और विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। RBI ने विदेशी निवेशकों को बिना किसी मात्रात्मक सीमा के भारत के दीर्घकालिक सरकारी बॉन्ड में निवेश की अनुमति दी है। केंद्र सरकार ने विदेशी निवेशकों के लिए सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाले दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ और ब्याज आय पर कर छूट प्रदान की है। इससे विदेशी निवेशकों का वास्तविक रिटर्न बढ़ेगा और भारतीय बॉन्ड बाजार वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनेगा।
इसके अतिरिक्त, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) पर लागू कुछ उप-सीमाओं को समाप्त कर निवेश प्रक्रिया को सरल बनाया गया है। अनिवासी भारतीयों (NRI) को भी कुछ शर्तों के तहत भारतीय शेयर बाजार में प्रत्यक्ष निवेश की सुविधा दी गई है। इन नीतियों का भारतीय अर्थव्यवस्था और कॉर्पोरेट क्षेत्र पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।
इन फैसलों से भारतीय रुपये पर बना दबाव कम होने की संभावना है। साथ ही, विदेशी निवेश बढ़ने से शेयर और बॉन्ड बाजारों में तरलता आएगी तथा अस्थिरता घटेगी। भारतीय कंपनियों के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से कम लागत पर पूंजी जुटाना आसान होगा, जिससे आधारभूत संरचना और विस्तार परियोजनाओं को गति मिलेगी।
गवर्नर संजय मल्होत्रा की नीतियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने वैश्विक वित्तीय अस्थिरता का सामना करने के लिए आवश्यक हर कदम उठाने की तत्परता दिखाई है। उनका दृष्टिकोण भारतीय वित्तीय बाजारों को अधिक वैश्विक, प्रतिस्पर्धी और मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। उद्योग जगत के लिए यह RBI पर भरोसा मजबूत करने वाला समय है। ऐसे दृढ़ और दूरदर्शी निर्णयों के लिए गवर्नर मल्होत्रा को शुभकामनाएं।
“शेयर बाजार में होने वाले स्वाभाविक उतार-चढ़ाव को रोकना हमारा उद्देश्य नहीं है। हमारा लक्ष्य अस्थिरता को नियंत्रित करना और अनियमित गतिविधियों पर अंकुश लगाना है। बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए हम पूरी तरह सतर्क और तैयार हैं।” – संजय मल्होत्रा ‘RBI’।
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