अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को घोषणा की कि इस वर्ष दक्षिण अफ्रीका में होने वाले G20 शिखर सम्मेलन में अमेरिका का कोई भी सरकारी प्रतिनिधि शामिल नहीं होगा। ट्रंप ने इसका कारण बताते हुए कहा कि दक्षिण अफ्रीका में श्वेत अफ्रीकानर (Afrikaner) किसानों के साथ हिंसा और उत्पीड़न किया जा रहा है, जिसे लेकर उनका प्रशासन कड़ा रुख अपनाए हुए है।
पहले यह अनुमान लगाया जा रहा था कि ट्रंप की अनुपस्थिति में उप-राष्ट्रपति जे.डी. वांस सम्मेलन में अमेरिका का प्रतिनिधित्व करेंगे। लेकिन एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, यह योजना भी रद्द कर दी गई, और अब अमेरिका पूरी तरह से इस सम्मेलन से गैर-हाज़िर रहेगा। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर लिखा, “यह पूरी तरह शर्मनाक है कि G20 दक्षिण अफ्रीका में आयोजित किया जा रहा है। अफ्रीकानरों के साथ अत्याचार हो रहे हैं — उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं, हिंसा की जा रही है, और लोग मारे जा रहे हैं।”
कौन है…अफ्रीकानर
अफ्रीकानेर (Afrikaner) दक्षिण अफ्रीका के एक विशिष्ट समुदाय हैं, जिनकी उत्पत्ति मुख्य रूप से 17वीं शताब्दी में नीदरलैंड, जर्मनी और फ्रांस से आए यूरोपीय बसने वालों से हुई थी। इन बसने वालों को प्रारंभ में डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) में कृषि और व्यापार के लिए बसाया था। धीरे-धीरे इन लोगों ने अपनी अलग पहचान विकसित की — भाषा, संस्कृति और धर्म के आधार पर। उनकी भाषा “अफ्रीकांस” (Afrikaans) डच भाषा से विकसित हुई, जिसमें स्थानीय अफ्रीकी भाषाओं, मलय और अंग्रेज़ी के शब्द भी शामिल हैं। धर्म के रूप में अधिकांश अफ्रीकानेर लोग प्रोटेस्टेंट ईसाई हैं और परिवार तथा परंपरा को बहुत महत्व देते हैं।
अफ्रीकानेर समुदाय दक्षिण अफ्रीका के इतिहास में राजनीतिक और सामाजिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली रहा है। ब्रिटिश शासन के खिलाफ उन्होंने बोअर युद्ध (Boer Wars) लड़े, और 20वीं शताब्दी में इन्हीं की सरकार ने अपार्थाइड (Apartheid) नस्लीय भेदभाव की नीति लागू की, जो 1990 के दशक तक चली। इस नीति की वजह से अफ्रीकानेरों को अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा। आज के दौर में अफ्रीकानेर दक्षिण अफ्रीका के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बसे हुए हैं, और शिक्षा, कृषि, उद्योग, तथा राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। समय के साथ उन्होंने अपनी पारंपरिक पहचान को आधुनिक दक्षिण अफ्रीकी समाज के साथ जोड़ने की दिशा में काफी बदलाव किए हैं।
दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकानर-समुदाय के मालिकानों वाली फार्मों और ग्रामीण इलाकों में जब-तब नस्लीय हमले और हत्याएँ होती रहती हैं। उदाहरण के लिए, एक बेहद खौफनाक मामला आया था जिसमें लिंपोपो प्रांत में दो महिलाएं मारी गईं और उनके शवों को सुअरों को खिलाए जाने का आरोप सामने आया है।
ट्रंप प्रशासन लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि दक्षिण अफ्रीका में श्वेत अल्पसंख्यक फार्म मालिकों पर हमले बढ़ रहे हैं, और सरकार उनकी पर्याप्त सुरक्षा नहीं कर रही। इस वर्ष की शुरुआत में अमेरिका ने अपने वार्षिक शरणार्थी कोटा में बदलाव करते हुए यह संकेत दिया था कि अधिकांश शरणार्थी, जिनका दावा है कि उन्हें जातीय भेदभाव या हिंसा झेलनी पड़ रही है, श्वेत दक्षिण अफ्रीकी हो सकते हैं।
दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने इन आरोपों को सीधे तौर पर खारिज किया है। राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने कहा था कि उन्होंने ट्रंप को स्पष्ट किया, “अफ्रीकानर किसानों पर अत्याचार और भेदभाव को लेकर जो सूचनाएँ उन्हें दी गईं, वे पूरी तरह गलत हैं।” अफ्रीकन सरकार का तर्क है कि, अपार्थाइड समाप्त होने के 30 साल बाद भी, दक्षिण अफ्रीिका में श्वेत आबादी का जीवन स्तर देश की अश्वेत बहुसंख्यक आबादी की तुलना में अब भी अधिक ऊंचा है।
ट्रंप ने हाल ही में मियामी में अपने एक भाषण में कहा था कि दक्षिण अफ्रीका को G20 से बाहर कर देना चाहिए।
इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी एक G20 विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि बैठक का एजेंडा “डाइवर्सिटी, इंक्लूज़न और जलवायु प्रयासों पर अत्यधिक केंद्रित” है। दूसरी ओर, दक्षिण अफ्रीकी सरकार का कहना है कि G20 की मेजबानी उसका अधिकार है, और अमेरिकी बहिष्कार का वैश्विक समूह के फैसलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
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