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Friday, February 13, 2026
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ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का प्लान फ्लॉप, भारत-चीन-रूस-EU समेत प्रमुख शक्तियों ने मुंह फेरा

60 में से सिर्फ 19 देशों ने दी हामी

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दावोस में आयोजित 2026 वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बहुप्रचारित पहल ‘बोर्ड ऑफ पीस’ फ्लॉप होते दिख रही है। वैश्विक संघर्षों में मध्यस्थता के उद्देश्य से गठित इस नए मंच के लॉन्च में  महज 19 देशों का समर्थन मिला, जबकि करीब 60 देशों को आमंत्रण भेजा गया था। भारत, चीन, रूस, फ्रांस, जर्मनी, जापान, यूरोपीय संघ और अन्य प्रमुख वैश्विक शक्तियों ने इस बोर्ड से दूरी बनाए रखी।

गौरतलब है कि ट्रंप का यह दावोस दौरा पहले ही विवादों में रहा। ग्रीनलैंड को लेकर उनके आक्रामक रुख पर यूरोपीय देशों के संयुक्त विरोध के बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा था। इसके तुरंत बाद ‘गाजा बोर्ड ऑफ पीस’ के रूप में पेश की गई यह नई पहल भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक समर्थन जुटाने में विफल रही।

डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार (22 जनवरी) सुबह दावोस में 2026 WEF के दौरान ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की औपचारिक घोषणा की। यह बोर्ड शुरुआत में गाजा में युद्धविराम और युद्धोत्तर स्थिरीकरण के लिए मध्यस्थता करने के उद्देश्य से बनाया गया है, लेकिन इसे आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के एक व्यापक मंच के रूप में पेश किया गया। व्हाइट हाउस अधिकारियों ने पहले दावा किया था कि आमंत्रित 60 देशों में से कम से कम 35 इस बोर्ड में शामिल होंगे, लेकिन लॉन्च के समय अमेरिका समेत केवल 20 देशों की उपस्थिति रही।

रिपोर्ट के मुताबिक, बोर्ड में शामिल और दावोस में मौजूद देशों में अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अज़रबैजान, बहरीन, बुल्गारिया, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कज़ाख़स्तान, कोसोवो, मंगोलिया, मोरक्को, पाकिस्तान, पराग्वे, क़तर, सऊदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात और उज़्बेकिस्तान शामिल हैं। इसके अलावा अल्बानिया, बेलारूस और वियतनाम ने बोर्ड में शामिल होने की सहमति जताई थी, लेकिन उनके नेता दावोस में मौजूद नहीं थे।

ध्यान देने वाली बात यह है कि पश्चिमी यूरोप का कोई भी देश इस बोर्ड में शामिल नहीं हुआ। इसे ग्रीनलैंड मुद्दे पर ट्रंप से यूरोपीय देशों की बढ़ती दूरी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। शामिल देशों की सूची में मुख्य रूप से मध्य पूर्व, मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप के देश हैं। इनमें से कई देश लोकतांत्रिक नहीं हैं और कई मुस्लिम-बहुल राष्ट्र हैं, जहां शासन व्यवस्था इस्लामी कानूनों पर आधारित है।

बोर्ड में शामिल न होने वाले कई देशों ने अपने फैसले पर सार्वजनिक बयान जारी किए। फ्रांस ने कहा कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर या प्रतिस्थापित करने की कोशिश कर सकता है, इसलिए वह इसमें शामिल नहीं होगा। ब्रिटेन ने पुष्टि की कि वह लॉन्च कार्यक्रम में मौजूद नहीं रहेगा। नॉर्वे, स्वीडन, स्लोवेनिया और चीन ने भी बोर्ड से दूरी बनाने की बात कही। कुछ देशों ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भेजे गए आमंत्रण पर आपत्ति जताई, हालांकि पुतिन ने भी यह कहते हुए शामिल होने से इनकार कर दिया कि उनकी सरकार इस मुद्दे पर अभी अपने रणनीतिक साझेदारों से परामर्श कर रही है। भारत, जर्मनी, इटली, जापान और यूरोपीय संघ समेत कई अन्य देशों ने कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया, लेकिन वे भी बोर्ड में शामिल नहीं हुए।

इसके बावजूद ट्रंप ने उम्मीद जताई है कि भविष्य में और देश इस पहल से जुड़ेंगे। उन्होंने कहा, “एक बार जब यह बोर्ड पूरी तरह बन जाएगा, तो हम लगभग कुछ भी कर सकते हैं जो हम करना चाहते हैं। और हम इसे यूनाइटेड नेशंस के साथ मिलकर करेंगे।”

‘गाजा बोर्ड ऑफ पीस’ ट्रंप की पश्चिम एशिया के लिए प्रस्तावित 20-सूत्रीय शांति योजना के दूसरे चरण का हिस्सा है। व्हाइट हाउस के अनुसार, बोर्ड की कार्यकारी समिति गाजा में शांति स्थापित करने और दीर्घकालिक विकास से जुड़े अहम क्षेत्र, जैसे शासन क्षमता निर्माण, क्षेत्रीय संवाद, पुनर्निर्माण, निवेश जुटाना और बड़े पैमाने पर वित्तपोषण की निगरानी करेगी।

इस बोर्ड के साथ एक वैकल्पिक सदस्यता शुल्क भी जुड़ा है। एक अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देने वाले देशों को स्थायी सीट दी जाएगी, जबकि बिना भुगतान वाले सदस्य तीन साल के कार्यकाल के लिए शामिल हो सकेंगे। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि लॉन्च के समय शामिल किसी भी देश ने यह शुल्क अदा किया है या नहीं।

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