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विश्व रंगमंच दिवस 2026 : थिएटर सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज का भी आईना!

'विश्व रंगमंच दिवस' की शुरुआत 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट (आईटीआई) ने की थी। साल 1962 में पहली बार इसे पूरे विश्व में मनाया गया।

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थिएटर (रंगमंच) सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि समाज का आईना है, जो हमारी कमजोरियों और ताकतों को सामने लाता है और लोगों के दिल-दिमाग पर भी असर डालता है। चाहे सामाजिक मुद्दे हों, सांस्कृतिक सवाल हों या राजनीतिक मसले, थिएटर हमेशा खुलकर इन पर बातें करता आया है।

यही वजह है कि रंगमंच सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने और सकारात्मक बदलाव लाने का एक सशक्त माध्यम माना जाता है। इसी माध्यम को सेलिब्रेट करने के लिए हर साल 27 मार्च को ‘विश्व रंगमंच दिवस’ मनाया जाता है।

‘विश्व रंगमंच दिवस’ की शुरुआत 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट (आईटीआई) ने की थी। साल 1962 में पहली बार इसे पूरे विश्व में मनाया गया। इसका मकसद दुनिया को रंगमंच की अहमियत और इसकी शक्ति से अवगत कराना है। यह दिन सिर्फ नाट्यकर्मियों के लिए खास नहीं है, बल्कि सभी रंगमंच प्रेमियों, कलाकारों और समाज के लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है। थिएटर समाज की आवाज है और समाज की शक्तियों को उजागर करने का मंच है।

रंगमंच हमें यह सिखाता है कि समाज की समस्याओं को उजागर करना कोई अपराध नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। थिएटर का मकसद सिर्फ हंसाना या रोना नहीं होता, बल्कि सवाल करना, चुनौती देना और जवाब ढूंढना भी है।

भारत में भी रंगमंच का एक लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। मुगल काल में धार्मिक कट्टरता के कारण नाटक को वह प्रोत्साहन नहीं मिला, जिससे अन्य कलाएं फली-फूलीं। इस वजह से कई सालों तक अभिनयशालाएं और प्रेक्षागार लगभग गायब हो गए। लेकिन, रामलीला जैसी लोक कलाओं ने थिएटर को जीवित रखा। अंग्रेजों के आने के बाद पाश्चात्य नाटक और थिएटर हमारे देश में आए।

आज थिएटर के कई कलाकारों ने न सिर्फ रंगमंच पर बल्कि फिल्मी पर्दे पर भी अपनी पहचान बनाई है, जैसे रतना पाठक शाह, नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी, मनोज बाजपेयी, ओम पुरी, पंकज त्रिपाठी, सौरभ शुक्ला, पीयूष त्रिपाठी, शाहरुख खान, पंकज कपूर और कई अन्य।

इन कलाकारों ने अपने अभिनय के जरिए समाज को सोचने पर मजबूर किया, संवेदनशील बनाया और यह दिखाया कि कला सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि जागरूकता और संवेदना फैलाने का जरिया भी हो सकती है।

इस दिन के आयोजन सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं हैं। देश के छोटे-बड़े ब्लॉक्स, कस्बे और गांव भी इस दिन को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। स्कूल, कॉलेज, थिएटर ग्रुप और सांस्कृतिक संस्थान अलग-अलग तरह के कार्यक्रम कभी ड्रामा, कभी मंचीय नाट्य और कभी स्ट्रीट प्ले आयोजित करते हैं।

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