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अपान से नाग-धनंजय तक, जानें शरीर की 10 वायु का महत्व और विज्ञान

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आयुर्वेद और योग के अनुसार, मानव शरीर में 10 प्रकार की वायु (प्राण) प्रवाहित होती है। ये प्राण जीवन ऊर्जा के रूप में काम करते हैं और सभी शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। आयुर्वेद में इन प्राणों को वायु तत्व का हिस्सा माना जाता है। इन्हें दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया है, जिनमें मुख्य प्राण और उप प्राण शामिल है।

मुख्य प्राण 5 होते हैं, जिन्हें पंचप्राण भी कहा जाता है और 5 उप-प्राण होते हैं। ये वायु श्वास लेना-छोड़ना, पाचन, रक्त संचार, बोलना, सोना-जागना, छींकना, जम्हाई लेना, पलक झपकाना जैसी क्रियाओं का संचालन करती हैं। इनका संतुलन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

मोरारजी देसाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ योगा के अनुसार, मुख्य प्राण या पंचप्राण शरीर की बुनियादी क्रियाओं के लिए जिम्मेदार हैं।

पहला है प्राण जिसका स्थान हृदय या छाती क्षेत्र है और इसका कार्य श्वसन (सांस लेना-छोड़ना), जीवन ऊर्जा का प्रवाह, हृदय और फेफड़ों के कार्य पर नियंत्रण है। दूसरा है अपान, जिसका स्थान गुदा या पेल्विक क्षेत्र होता है। इसका कार्य रेचक-कुम्भक, मल-मूत्र त्याग, शरीर के निचले हिस्से की ओर ऊर्जा का संचालन, उत्सर्जन प्रक्रिया को नियंत्रित करना। तीसरा है समान और इसका स्थान नाभि क्षेत्र है। इसका कार्य पाचन, भोजन का अवशोषण, पोषक तत्वों का वितरण, अग्नि (पाचन शक्ति) का संतुलन करना होता है।

उदान का स्थान गला होता है और यह निगलने, वमन, वाणी और ऊपर की ओर ऊर्जा का प्रवाह, मस्तिष्क कार्य को देखता है। व्यान का स्थान नेत्र और पूरे शरीर में व्याप्त होता है। इसका कार्य रक्त संचार, पलक झपकाना, शरीर की सभी गतिविधियां, शरीर में ऊर्जा का विस्तार करना होता है।

उप-प्राण छोटी-छोटी विशिष्ट क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। इनमें पहला है नाग जिसका स्थान समस्त शरीर में व्याप्त होता है और कार्य मोचक जैसे डकार, चालक या गति प्रदान करना होता है। दूसरा कूर्म है जो कंठ के साथ ही पूरे शरीर में व्याप्त होता है। इसका काम अवशोषण, वृद्धि, पलक झपकाना जैसी संकुचन क्रियाएं करना है। वहीं, कृकर या कृकल का स्थान भी कंठ होता है और यह भूख-प्यास का संकेत, उद्गार या छींकना, खांसना करना है।

उप प्राण में देवदत्त भी शामिल है, जिसका स्थान मुख और कार्य उबासी लेना है। साथ ही धनंजय भी है, जिसका स्थान सम्पूर्ण शरीर में है और काम अनाहत नाद यानी मृत्यु के बाद भी शरीर में रहना, विघटन रोकना है।

ये प्राण वायु शरीर के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इनका संतुलन प्राणायाम, योगासन और ध्यान से किया जा सकता है, जिससे पाचन, श्वास, मानसिक शांति और समग्र स्वास्थ्य बेहतर होता है। असंतुलन से गैस, श्वास रोग, थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

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