भारत ने अपनी पहली पूर्णतः स्वदेशी रूप से डिजाइन की गई पारंपरिक पनडुब्बी P-76 SSK की पहली झलक सार्वजनिक कर रक्षा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। प्रोजेक्ट-76 के तहत विकसित की जा रही यह नई पीढ़ी की पनडुब्बी भारतीय नौसेना की समुद्री युद्ध क्षमता को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की दिशा में एक निर्णायक कदम मानी जा रही है।
रिपोर्टों के अनुसार, यह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक मजबूत समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से शुरू किया गया है। परियोजना के तहत अत्याधुनिक स्टेल्थ क्षमता, लंबी अवधि तक पानी के भीतर संचालन और उन्नत हमला करने की क्षमता वाली डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का बेड़ा तैयार किया जाएगा।
Is this the DRDO-WDB-L&T proposed design for the P-76? Or, it's that one to be powered by the energy of the Sun! The first 2 Indian SSN will be built in the SBC, Visakhapatnam & will be close to 10000T (Sandeep Unnithan). I can't distinguish. But yes, I expected X bow & pump jet. pic.twitter.com/YhXnqNiM8b
— Sankalan Chattopadhyay (@VinodDX9) June 5, 2026
प्रोजेक्ट-76 भारत का पहला ऐसा कार्यक्रम है जिसमें पारंपरिक पनडुब्बी का डिजाइन पूरी तरह स्वदेशी स्तर पर विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना का नेतृत्व भारतीय नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो (Warship Design Bureau) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा किया जा रहा है। उत्पादन में निजी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) की महत्वपूर्ण भूमिका रहने की संभावना है।

परियोजना के तहत कुल 12 आधुनिक पनडुब्बियों का निर्माण प्रस्तावित है। प्रत्येक पनडुब्बी का वजन लगभग 3,000 टन होगा और इनमें 70 से 80 प्रतिशत तक स्वदेशी उपकरण एवं प्रणालियां शामिल होंगी। इसे भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी छलांग माना जा रहा है, क्योंकि इससे विदेशी रक्षा कंपनियों पर निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आएगी।
P-76 पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) प्रणाली, लिथियम-आयन बैटरियां और अत्याधुनिक पंप-जेट प्रोपल्शन तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इन तकनीकों की मदद से पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकेंगी और उनकी ध्वनि पहचान (Acoustic Signature) बेहद कम होगी, जिससे दुश्मन के लिए उनका पता लगाना कठिन हो जाएगा।
Yes. First look at the P-76 SSK- India’s first indigenously designed conventional submarine. More details here :https://t.co/GNIajpZh1u https://t.co/FPRsEeTnOj pic.twitter.com/M7KHIN6UW4
— Sandeep (@SandeepUnnithan) June 5, 2026
इसके अलावा, इन पनडुब्बियों में उन्नत स्टेल्थ तकनीक और वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (VLS) भी होगा, जिससे लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें दागी जा सकेंगी। भारी वजन वाले टॉरपीडो और एकीकृत युद्ध प्रबंधन प्रणाली (Integrated Combat Systems) उनकी मारक क्षमता को और अधिक मजबूत बनाएंगे। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन विशेषताओं के कारण P-76 एशिया की सबसे उन्नत पारंपरिक पनडुब्बियों में शामिल हो सकती है।
परियोजना की समयसीमा भी काफी महत्वाकांक्षी रखी गई है। तकनीकी डिजाइन पर काम पहले ही शुरू हो चुका है, जबकि आवश्यक स्वीकृतियां और अनुबंध वर्ष 2028 तक मिलने की उम्मीद है। मुंबई स्थित MDL और कट्टुपल्ली स्थित L&T शिपयार्ड में समानांतर उत्पादन लाइनें स्थापित करने की योजना बनाई गई है ताकि निर्माण प्रक्रिया को तेज किया जा सके। पहला प्रोटोटाइप वर्ष 2034 तक नौसेना में शामिल किए जाने का लक्ष्य है, जबकि पूरे बेड़े को 2041 तक परिचालन में लाने की योजना है।
यदि यह समयसीमा पूरी होती है, तो प्रोजेक्ट-76 भारत के इतिहास का सबसे तेज गति से पूरा किया गया पारंपरिक पनडुब्बी कार्यक्रम बन सकता है। यह परियोजना उन क्षमता अंतरालों को भी भरने में मदद करेगी जो आने वाले वर्षों में पुरानी किलो-क्लास और शिशुमार-क्लास पनडुब्बियों की सेवानिवृत्ति के कारण उत्पन्न होने वाले हैं।
रणनीतिक दृष्टि से यह परियोजना भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वर्तमान में चीन के पास 65 से अधिक पनडुब्बियां हैं, जबकि पाकिस्तान भी चीनी तकनीक आधारित नई पनडुब्बियों के जरिए अपने बेड़े का आधुनिकीकरण कर रहा है। दूसरी ओर, भारत के मौजूदा 19 पनडुब्बियों के बेड़े में आने वाले वर्षों में कमी आने की संभावना है। ऐसे में प्रोजेक्ट-76 हिंद महासागर क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने और भारत की समुद्री श्रेष्ठता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
यह कार्यक्रम भारत की परमाणु ऊर्जा संचालित आक्रमणकारी पनडुब्बी परियोजना प्रोजेक्ट-77 के साथ मिलकर एक संतुलित और आधुनिक पनडुब्बी बेड़े के निर्माण की दिशा में भी योगदान देगा।
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