भारत द्वारा हाल के वर्षों में किए गए नई पीढ़ी के मुक्त व्यापार समझौते (FTA) देश के विनिर्माण क्षेत्र, निजी निवेश और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकरण को नई गति दे सकते हैं। येस सिक्योरिटीज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं और वैश्विक “चीन प्लस वन” रणनीति का लाभ सही ढंग से उठाया गया, तो भारत के लिए वर्ष 2030 तक 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के माल निर्यात का लक्ष्य हासिल करने का यह सबसे मजबूत अवसर साबित हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की हालिया FTA नीति देश की आर्थिक रणनीति में एक बड़े बदलाव को दर्शाती है। पहले जहां भारत अपेक्षाकृत संरक्षणवादी दृष्टिकोण अपनाता था, वहीं अब वह वैश्विक व्यापार के साथ गहरे एकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
येस सिक्योरिटीज़ के अनुसार, ये समझौते केवल शुल्क कम करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आने वाले वर्षों में उद्योग और निर्यात आधारित विकास चक्र की नींव साबित हो सकते हैं। संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA), ओमान, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ हो रहे समझौतों को औद्योगिक कॉरिडोर, बंदरगाहों के आधुनिकीकरण और आपूर्ति श्रृंखला के स्थानीयकरण जैसी पहलों के साथ जोड़ा जा रहा है।
$81 Billion in FDI inflows. A strong sign that global investors continue to see long-term potential in India
Technology, services, and manufacturing remain key drivers behind India’s cumulative FDI inflows of over $1.12 trillion.
As businesses look for growth, India is… pic.twitter.com/FCwXEILnbv
— YES SECURITIES (@yessecurities) June 11, 2026
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत उन चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिनके पास बड़े पैमाने पर विनिर्माण गतिविधियों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त श्रमशक्ति, विशाल घरेलू बाजार और उत्पादन क्षमता मौजूद है।
विशेषज्ञों के अनुसार, एफटीए का सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव निजी निवेश पर पड़ सकता है। वर्तमान में देश में औद्योगिक क्षमता उपयोग लगभग 75 प्रतिशत के आसपास है, जिसके कारण कंपनियां बड़े पूंजी निवेश (कैपेक्स) को लेकर सतर्क बनी हुई हैं। यदि एफटीए के माध्यम से निर्यात मांग लगातार बढ़ती है, तो उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग होगा, लागत कम होगी और अंततः निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ सकता है।
रिपोर्ट में पूर्वी एशियाई देशों का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि वहां निर्यात आधारित विकास ने विनिर्माण विस्तार और पूंजी निर्माण को गति दी थी और भारत भी उसी राह पर आगे बढ़ सकता है।
सेवा क्षेत्र को भी भारत के निर्यात इंजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। भारत ने 2030 तक कुल 2 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य रखा है, जिसमें 1 ट्रिलियन डॉलर माल निर्यात और 1 ट्रिलियन डॉलर सेवा निर्यात से आने की उम्मीद है। रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ समझौते आईटी सेवाओं, परामर्श, इंजीनियरिंग अनुसंधान एवं विकास तथा वित्तीय सेवाओं के लिए नए अवसर पैदा करेंगे।
हालांकि, येस सिक्योरिटीज़ ने चेतावनी भी दी है कि केवल बाजारों तक पहुंच मिलने से सफलता सुनिश्चित नहीं होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती बाजार तक पहुंच नहीं, बल्कि घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता है।
वर्ष 2015 से 2025 के बीच भारत के माल निर्यात में औसत वार्षिक वृद्धि दर केवल 3.5 प्रतिशत रही है। उच्च लॉजिस्टिक लागत, महंगी बिजली, जटिल अनुपालन प्रक्रियाएं और अपेक्षाकृत कम श्रम उत्पादकता जैसी संरचनात्मक समस्याएं अब भी बनी हुई हैं।
रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यदि इन घरेलू चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया, तो आयात की गति निर्यात से अधिक बढ़ सकती है, जिससे व्यापार घाटा और बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
इसके बावजूद, येस सिक्योरिटीज़ का मानना है कि एफटीए, पीएलआई योजनाएं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव भारत को आने वाले वर्षों में एक प्रमुख विनिर्माण और निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखते हैं।
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