भारतीय फुटबॉल एक बार फिर संकट के मुहाने पर खड़ा है। इंडियन सुपर लीग (ISL) जिसे कभी भारतीय फुटबॉल के पुनर्जागरण की शुरुआत माना गया था, अब अपने भविष्य को लेकर गहरी अनिश्चितता में है। ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) द्वारा 16 अक्टूबर को जारी किए गए नए ISL टेंडर को कोई भी बोली लगाने वाला नहीं मिला। यह स्थिति न केवल लीग की आर्थिक मॉडल पर सवाल उठाती है, बल्कि भारतीय फुटबॉल के व्यापक ढांचे पर भी गंभीर चिंताएँ पैदा कर रही है।
इसी बीच, मौजूदा चैंपियन मोहन बागान सुपर जायंट ने संचालन में अस्थायी विराम की घोषणा कर दी। क्लब ने कहा कि जब तक लीग की संरचना और आर्थिक स्पष्टता नहीं आती, तब तक प्रथम टीम के संचालन को रोका जाएगा। दूसरी ओर, उनके ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी ईस्ट बंगाल ने अभी गतिविधियाँ जारी रखने का निर्णय लिया है, हालांकि क्लब के भीतर अनिश्चितता और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। ईस्ट बंगाल के वरिष्ठ अधिकारी देबव्रत सरकार ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) से अपील की है कि वह कुछ वर्षों के लिए भारतीय फुटबॉल को वित्तीय सहयोग दे। उन्होंने कहा कि, “अगर BCCI चार-पांच वर्षों तक 100 से 150 करोड़ रुपये का सहयोग दे दे, तो इससे भारतीय फुटबॉल को दोबारा खड़ा किया जा सकता है।”
यह अपील भावुक अवश्य है, लेकिन यह सवाल उठाती है की लंबे समय से नजरअंदाज इस खेल में पहले भी पैसे निवेश हो चुके है फिर भी विशेष वृद्धी नहीं दिखी। 2014 में जब ISL शुरू हुई, तो इसका मॉडल क्रिकेट की इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) की तर्ज पर तैयार किया गया था। बाहरी चमक, विदेशी खिलाड़ियों की मौजूदगी और सेलिब्रिटी मालिकों के कारण शुरुआती उत्साह बना, लेकिन लंबे समय के लिए फुटबॉल केवल ग्लैमर पर नहीं चल सकता। अधिकांश क्लब लगातार घाटे में चले, युवा प्रशिक्षण केंद्रों और स्थानीय प्रतिभा विकास पर अपेक्षित निवेश नहीं हुआ और लीग का वित्तीय ढांचा ठोस आधार नहीं पा सका।
इसके उलट, क्रिकेट का बोर्ड एक केंद्रीकृत और स्थिर आर्थिक संरचना पर खड़ा है। मीडिया अधिकार, राजस्व साझेदारी, और घरेलू से लेकर शीर्ष स्तर तक निवेश की निरंतरता ने क्रिकेट को आत्मनिर्भर बनाया। यही वह मॉडल है जो AIFF को समझने और अपनाने की जरूरत है। BCCI के दखल की संभावना बहुत कम है, क्योंकि दोनों निकायों की भूमिकाएँ अलग हैं। लेकिन भारतीय फुटबॉल, क्रिकेट की वित्तीय पारदर्शिता और संरचना से सीख जरूर ले सकता है।
ISL का यह संकट एक चेतावनी भी है अगर जमीनी स्तर पर निवेश, राजस्व संरचना में सुधार और क्लबों को वित्तीय सुरक्षा नहीं दी गई, तो भारतीय फुटबॉल बार-बार इसी मोड़ पर लौटेगा। खेल के पास प्रतिभा और दर्शक दोनों हैं, कमी केवल दीर्घकालिक योजना की है।
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