भारत स्वदेशी रक्षा तकनीकों के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसी दिशा में अब एक नई हाई-पावर लेजर हथियार प्रणाली विकसित की जा रही है। पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज लिमिटेड को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की प्रमुख प्रयोगशाला उच्च ऊर्जा प्रणाली और विज्ञान केंद्र(CHESS) से ₹142.31 करोड़ का महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट मिला है। यह परियोजना भारत की भविष्य की युद्ध क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
मार्च 2025 में मिले इस अनुबंध के तहत कंपनी को एक अत्याधुनिक लेजर स्रोत मॉड्यूल विकसित करना है, जिसे बीम नियंत्रण प्रणाली (BCS) के साथ एक मोबाइल प्लेटफॉर्म पर एकीकृत किया जाएगा। यह पूरी प्रणाली “RayStrike-9” नाम के हाई-पावर लेजर सिस्टम का हिस्सा होगी, जिसे विशेष रूप से एंटी-ड्रोन और एंटी-मिसाइल भूमिकाओं के लिए तैयार किया जा रहा है। परियोजना को 24 महीनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे इसकी रणनीतिक प्राथमिकता और तात्कालिकता स्पष्ट होती है।
RayStrike-9 को भारत की निर्देशित ऊर्जा हथियार (Directed Energy Weapon) क्षमता में बड़ी छलांग माना जा रहा है। इस प्रणाली में एडवांस ऑप्टिक्स, पावर मैनेजमेंट और प्रिसिजन टार्गेटिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसे मोबाइल प्लेटफॉर्म पर आधारित रखने का उद्देश्य यह है कि इसे अलग-अलग इलाकों और सैन्य परिस्थितियों में तेजी से तैनात किया जा सके।
यह हाई-एनर्जी लेजर सिस्टम दुश्मन के ड्रोन, UAVs और आने वाली मिसाइलों को निष्क्रिय करने में सक्षम होगा। आधुनिक युद्ध में कम लागत वाले ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन के बढ़ते इस्तेमाल ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। ऐसे में RayStrike-9 जैसी प्रणाली भारतीय सेना को तेज और सटीक प्रतिक्रिया देने की क्षमता प्रदान कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लेजर आधारित हथियार पारंपरिक मिसाइल इंटरसेप्टर की तुलना में अधिक किफायती साबित हो सकते हैं। इनमें बार-बार उपयोग की सुविधा होती है और गोला-बारूद की पुनः आपूर्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती। यही कारण है कि दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियां इस तकनीक पर तेजी से निवेश कर रही हैं।
पारस डिफेंस पहले से ऑप्टिक्स, इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक शील्डिंग और स्पेस टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में सक्रिय है। यह नया प्रोजेक्ट कंपनी को भारत के उभरते रक्षा उद्योग में और मजबूत स्थिति देगा। DRDO की रिसर्च विशेषज्ञता और निजी उद्योग की उत्पादन क्षमता का यह सहयोग “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को भी मजबूती देगा।
अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों ने पहले ही हाई-पावर लेजर हथियार प्रणालियों पर बड़े स्तर पर काम किया है। ऐसे में भारत का RayStrike-9 कार्यक्रम यह दर्शाता है कि देश भविष्य की सैन्य तकनीकों में आत्मनिर्भरता और तकनीकी प्रतिस्पर्धा हासिल करने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रहा है।
यदि परियोजना तय समयसीमा के अनुसार आगे बढ़ती है, तो 2027 तक इसके शुरुआती ट्रायल शुरू हो सकते हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सफल परीक्षण के बाद यह प्रणाली भारत की वायु रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में निर्यात के नए अवसर भी पैदा कर सकती है।
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पारस डिफेंस विकसित करेगी ‘RayStrike-9’ हाई-पावर लेजर हथियार प्रणाली
