महाराष्ट्र सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए “महाराष्ट्र राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग” की स्थापना को मंगलवार को कैबिनेट से मंजूरी दे दी है। यह कदम राज्य के लाखों आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा और उनके विकास में तेजी लाने हेतु अत्यंत निर्णायक माना जा रहा है। इससे आदिवासी समाज को अपनी बात रखने के लिए नया मंच मिलेगा।
पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री भारती प्रवीण पवार ने शुक्रवार को कहा, “यह आयोग आदिवासी समाज के लिए केवल एक प्रशासकीय निर्णय नहीं है, बल्कि यह उनके सम्मान, अधिकार और न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। मैं इस पहल का हृदय से स्वागत करती हूं।”
उन्होंने कहा, “वर्षों से आदिवासी समाज जिन समस्याओं से जूझता आ रहा था, अब उन्हें एक समर्पित मंच मिलेगा। इस आयोग के जरिए शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि और सरकारी योजनाओं की समस्याओं का तुरंत समाधान संभव होगा।
इससे पहले सीएम फडणवीस ने कहा था, “यह अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण और उनके अधिकारों के लिए एक निर्णायक कदम है। सरकार केवल घोषणाएं नहीं करती, बल्कि जमीन पर काम करके दिखाती है।”
आदिवासी विकास मंत्री उइके ने कहा था, “यह आयोग आदिवासी समुदाय की आवाज के लिए एक आधिकारिक और प्रभावी मंच है। यह निर्णय उनके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की जीत है।”
उल्लेखनीय है कि सीएम फडणवीस के नेतृत्व में और आदिवासी विकास मंत्री प्रो. डॉ. अशोक उइके के प्रयासों से यह मांग अब मूर्त रूप ले पाई है। आयोग को वैधानिक दर्जा प्राप्त होगा, जिसमें एक अध्यक्ष और चार गैर-सरकारी सदस्य होंगे। आयोग की कार्यप्रणाली स्वतंत्र होगी और इसके संचालन हेतु लगभग 4.20 करोड़ रुपए का वित्तीय प्रावधान किया गया है। इसके लिए 26 नए पदों का सृजन भी किया जाएगा।
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