युद्धों में ड्रोन और काउंटर ड्रोन अहम, आत्मनिर्भर इकोसिस्टम जरूरी: राजनाथ सिंह!
उन्होंने बताया कि आज भारत में एक ऐसे ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम के निर्माण की जरूरत है, जिसमें हम पूरी तरह आत्मनिर्भर हों।
Team News Danka
Updated: Thu 19th March 2026, 02:38 PM
Drones and Counter-Drone Systems Are Crucial in Warfare; a Self-Reliant Ecosystem Is Essential: Rajnath Singh. Addressing the National Defence Industries Conclave held in New Delhi on Thursday, Defence Minister Rajnath Singh stated that at a time when the entire world is witnessing the ongoing conflicts—between Russia and Ukraine, as well as between Iran and Israel—it is clearly evident that drones and counter-drone technology play a pivotal role in future warfare. He emphasized that there is an urgent need to establish a drone manufacturing ecosystem in India today in which we are completely self-reliant. This self-reliance is imperative not merely at the product level, but also at the component level—meaning that everything, from drone modules to software, engines, and batteries, must be manufactured right here in India!
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित नेशनल डिफेंस इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए कहा कि आज जब पूरी दुनिया रूस और यूक्रेन के साथ-साथ ईरान-इजरायल के बीच जारी संघर्ष को देख रही है, तो हम साफ देख सकते हैं कि फ्यूचर वॉरफेयर में ड्रोन्स और काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी की बहुत बड़ी भूमिका है।
उन्होंने बताया कि आज भारत में एक ऐसे ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम के निर्माण की जरूरत है, जिसमें हम पूरी तरह आत्मनिर्भर हों। यह आत्मनिर्भरता सिर्फ प्रोडक्ट के स्तर पर ही नहीं बल्कि कंपोनेंट के स्तर पर भी जरूरी है। यानी ड्रोन के मॉड्यूल से लेकर सॉफ्टवेयर, इंजन और और बैटरी सभी भारत में ही बने। यह काम आसान नहीं है क्योंकि अधिकांश देशों में जहां ड्रोन्स बनते हैं, वहां कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट चीन से आयात किए जाते हैं।
नेशनल डिफेंस इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव का उद्देश्य स्वदेशी रक्षा उपकरण के निर्माण को प्रोत्साहित करना है। यह भारत में रक्षा उपकरण बनाने का मजबूत तंत्र स्थापित करने का एक बड़ा प्रयास है।
खास तौर पर प्राइवेट कंपनियों, छोटे और मध्यम उद्योगों, यानी एमएसएमई को इस सेक्टर से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि वे भी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में हिस्सा ले सकें। यहां मौजूद राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की रक्षा तैयारियों और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए यह जरूरी है कि भारत ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग में पूरी तरह आत्मनिर्भर बने।
उन्होंने यहां मौजूद एमएसएमई व अन्य लोगों का आह्वान करते हुए कहा कि इस काम में देश को आप सभी की जरूरत है। सरकार की तरफ से आपको हर तरह का समर्थन प्राप्त होगा। हम सबको मिलकर मिशन मोड में काम करना होगा ताकि 2030 तक भारत, स्वदेशी ड्रोन निर्माण का ग्लोबल हब बन जाए।
उन्होंने कहा कि किसी भी देश के डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम को बनाने में जहां पर बड़ी इंडस्ट्रीज, एमएसएमई, स्टार्टअप्स और इनोवेटर्स का हाथ होता है। वहीं, सरकार की तरफ से देश की रक्षा जरूरतों के अनुसार स्पष्ट पॉलिसी पुश का भी हाथ होता है।
कई बार बड़ा परिवर्तन एक छोटे विचार और छोटे प्रयास से ही शुरू होता है। इसलिए जो अपने-अपने क्षेत्र में काम कर रहे हैं, यह मानकर चलिए कि आपकी आज की छोटी शुरुआत कल बड़ी सफलता में बदल सकती है।
उन्होंने कहा कि आज भी भारत की जीडीपी में इंडस्ट्री का योगदान लगभग 15–16 प्रतिशत के आसपास है, जो यह दिखाता है कि एमएसएमई के आगे बढ़ने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। विशेष रूप से निर्माण क्षेत्र के विस्तार के माध्यम से, अर्थव्यवस्था को और मजबूत बनाया जा सकता है। अब इस दिशा में आगे बढ़ने की जिम्मेदारी उद्योग जगत और इनोवेटर्स पर है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि यह हम सबका राष्ट्र धर्म है। एक दशक में सरकार ने एमएसएमई सेक्टर को मजबूत बनाने के लिए, कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 2014 के बाद प्रधानमंत्री ने इस सेक्टर के विस्तार पर लगातार ध्यान दिया है।
एमएसएमई के पंजीकरण और पहचान को आसान बनाने के लिए, उद्यम पोर्टल और उद्यम अस्सिट पोर्टल जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स शुरू किए गए हैं। ताकि छोटे उद्योगों को, औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़कर, उनतक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा सके।
उन्होंने कहा, ”अगर मैं आंकड़ों की बात करूं तब भी यह परिवर्तन साफ दिखाई देता है। 2012-13 के आसपास देश में एमएसएमई की संख्या करीब 4.67 करोड़ थी। हाल के आंकड़ों के अनुसार, यह संख्या लगभग 8 करोड़ के आसपास पहुंच गई है।
जब हम सभी मिलकर काम करेंगे, तभी एक मजबूत इनोवेशन ईको सिस्टम बनेगा। यदि हम सभी मिलकर पूरी शक्ति और समर्पण के साथ आगे बढ़ें, तभी हम अपने लक्ष्य तक पहुंच पाएंगे।
उन्होंने बताया कि 58 प्रोटोटाइप को खरीद के लिए मंजूरी मिल चुका है, जिनकी औसत वैल्यू लगभग 3,853 करोड़ रुपए है। 45 प्रक्योरमेंट कांट्रेक्ट भी साइन किए जा चुके हैं, जिनकी वैल्यू करीब 2,326 करोड़ रुपए है।
ये आंकड़े बताते हैं कि आज इनोवेशन धीरे-धीरे उत्पाद और टेक्नोलॉजी के रूप में सामने आ रहा है, और इसमें हमारे स्टार्टअप और एमएसएमई की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।