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Wednesday, November 4, 2026
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बिहार की प्राचीन विरासत को वैश्विक पहचान, ऐतिहासिक स्थलों का वैज्ञानिक सर्वे!

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि विशेषज्ञों की सिफारिशों के अनुरूप चरणबद्ध कार्य योजना तैयार की जाए। साथ ही पूरे क्षेत्र की पर्यटन क्षमता का समग्र विकास किया जाए| 

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बिहार सरकार ने राज्य की हजारों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने तथा उन्हें विश्वस्तरीय पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बोधगया, सुल्तानगंज, मंदार, केसरिया स्तूप और कैमूर स्थित मां मुंडेश्वरी मंदिर परिसर सहित प्रमुख पुरातात्विक स्थलों के वैज्ञानिक सर्वेक्षण, संरक्षण, उत्खनन और समग्र विकास के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश दिया है।

सीएम सम्राट चौधरी ने मंगलवार को देश के वरिष्ठ पुरातत्वविदों और विशेषज्ञों के प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक की। बैठक में कैमूर जिले के मां मुंडेश्वरी मंदिर परिसर और आसपास बिखरे प्राचीन भग्नावशेषों के वैज्ञानिक संरक्षण और पुनर्स्थापन पर विस्तार से चर्चा हुई।

विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इन अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण, प्रलेखन और पुनर्स्थापन कर पूरे क्षेत्र को भारतीय पुरातात्विक विरासत के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि विशेषज्ञों की सिफारिशों के अनुरूप चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार की जाए। साथ ही पूरे क्षेत्र की पर्यटन क्षमता का समग्र विकास किया जाए, ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अनुभव मिल सके।

बैठक में पद्मश्री डॉ. केके मोहम्मद, प्रो. रजत सान्याल, प्रो. अनिल कुमार तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकारियों सहित कई विशेषज्ञ उपस्थित थे। बैठक में कैमूर क्षेत्र के तिलहाड़ कुंड, करकटगढ़ और अन्य प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व के स्थलों को एकीकृत रूप से विकसित करने की योजना पर भी विचार किया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक संरक्षण और सुनियोजित विकास के बाद इन क्षेत्रों को भविष्य में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की दिशा में भी प्रयास किए जा सकते हैं। मुख्यमंत्री ने बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर और उसके आसपास अत्याधुनिक लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग तथा ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार तकनीक के माध्यम से सर्वेक्षण कराने का भी निर्देश दिया।

इन तकनीकों की मदद से बिना खुदाई किए जमीन के भीतर मौजूद संभावित पुरातात्विक संरचनाओं और अवशेषों की पहचान की जा सकेगी, जिससे भविष्य में उत्खनन कार्य अधिक सटीक और प्रभावी होगा। इसके अलावा सुल्तानगंज और मंदार क्षेत्र के ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण और समग्र विकास पर विशेष जोर दिया गया।

उन्होंने कहा कि इन स्थलों की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता को व्यवस्थित ढंग से संरक्षित और प्रस्तुत किया जाए, ताकि धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को नई गति मिल सके। बैठक में विश्व के सबसे बड़े बौद्ध स्तूपों में शामिल केसरिया स्तूप के शेष हिस्से के वैज्ञानिक उत्खनन का भी निर्णय लिया गया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि अब तक स्तूप का केवल आंशिक उत्खनन हुआ है, जबकि इसके बड़े हिस्से में अभी भी महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष होने की संभावना है। उन्होंने शेष क्षेत्र के वैज्ञानिक उत्खनन और संरक्षण की प्रक्रिया तेज करने का निर्देश दिया।

उन्होंने कहा कि बिहार की धरती के नीचे अब भी अनेक महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर सुरक्षित हैं। इनके वैज्ञानिक सर्वेक्षण, उत्खनन और संरक्षण से राज्य के इतिहास के नए अध्याय सामने आएंगे। साथ ही सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

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