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गोविंद पानसरे हत्या में आरोपियों को मुंबई उच्च न्यायलय से जमानत !

दो अन्य आरोपियों को भी राहत

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वरिष्ठ लेखक और कम्युनिस्ट नेता गोविंद पानसरे हत्याकांड के मुख्य आरोपी वीरेंद्रसिंह तावड़े को मंगलवार (14 अक्तूबर)को मुंबई उच्च न्यायलय की कोल्हापुर बेंच ने जमानत दी है। अदालत ने दो अन्य आरोपियों शरद कलसकर और अमोल काले को भी जमानत दी है। हालांकि, कलसकर फिलहाल जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे क्योंकि उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर हत्या मामले (2013) में पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है और उनकी अपील हाईकोर्ट में लंबित है।

गोविंद पानसरे की हत्या 20 फरवरी 2015 को कोल्हापुर में हुई थी। इस मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसियों ने कई लोगों को गिरफ्तार किया, जिन पर आरोप था कि वे एक विचारधारा-प्रेरित हत्या श्रृंखला का हिस्सा थे, जिसमें दाभोलकर (2013), विद्वान एम.एम. कलबुर्गी (2015) और पत्रकार गौरी लंकेश (2017) की हत्याएं की गई, हालांकि उन में से अधिकतर निर्दोष सिद्ध हुए और कुछ पर राष्ट्रीय एजेंसिया दोषी सिध्द नहीं कर पाई।

मंगलवार को जस्टिस शिवकुमार डिगे की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा, “आवेदन स्वीकार किए जाते हैं, विस्तृत आदेश बाद में पारित किया जाएगा।” पानसरे परिवार की ओर से पेश वकील अमित सिंह ने इस आदेश पर रोक लगाने की मांग की और कहा, “तावड़े इस हत्या के मुख्य साजिशकर्ता हैं।” हालांकि, अदालत ने इस अनुरोध को अस्वीकार करते हुए कहा, “जमानत आदेश पर रोक नहीं लगाई जा सकती।” बचाव पक्ष के वकील विरेंद्र इचलकरंजीकर ने जमानत की प्रक्रिया और शर्तों को लेकर स्पष्टीकरण मांगा, जिस पर अदालत ने कहा कि आरोपी को नई जमानती जमानतें (sureties) प्रस्तुत करनी होंगी।

तावड़े को इससे पहले भी जमानत दी गई थी, लेकिन पिछले साल कोल्हापुर सेशंस कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया था। उस समय अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि उसके पास आरोपी की संलिप्तता के नए साक्ष्य हैं। इसके बाद तावड़े ने दोबारा बॉम्बे हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर की थी, जिस पर वकील नीतीन प्रधान ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत रद्द करना कानूनन गलत था और अन्य आरोपियों को जमानत मिलने के समानता के आधार पर (parity grounds) उन्हें भी राहत मिलनी चाहिए।

लम्बी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने तावड़े और अन्य दो आरोपियों को जमानत दे दी। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हत्या श्रृंखला से जुड़े मामलों में अभियोजन पक्ष की रणनीति और जांच की दिशा पर फिर से सवाल उठ रहे हैं। अदालत का विस्तृत आदेश आने के बाद यह साफ होगा कि किन शर्तों के तहत आरोपी जेल से बाहर आ सकेंगे।

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