धर्मगुरु बद्रे आलम मानसिक रूप से बीमार, इलाज की जरूरत

डॉ. शाकिर अली की कड़ी प्रतिक्रिया

धर्मगुरु बद्रे आलम मानसिक रूप से बीमार, इलाज की जरूरत

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योग दिवस और सूर्य नमस्कार को लेकर मुस्लिम धर्मगुरु बद्रे आलम के विवादित बयान पर ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शाकिर अली मंसूरी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बद्रे आलम को “मानसिक रूप से बीमार” बताते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि उन्हें इलाज की जरूरत है।

समाचार एजेंसी IANS से विशेष बातचीत में डॉ. शाकिर अली ने बद्रे आलम के उस बयान की निंदा की, जिसमें उन्होंने कहा था कि योग दिवस और सूर्य नमस्कार मुसलमानों पर थोपे जा रहे हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. अली ने कहा, “कोई भी मुस्लिम धर्मगुरु इस्लामिक मूवमेंट का ठेकेदार नहीं बन सकता। जो लोग इस तरह की बातें करते हैं, वे मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं। बद्रे आलम का बयान नफरत और भ्रम फैलाने वाला है। यह एक कट्टरपंथी सोच का हिस्सा है, जो समाज को बांटने की दिशा में खतरनाक है।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहीं भी नमाज बंद करने की बात नहीं कही। “उन्होंने बस इतना कहा कि आप जो भी योग करते हैं, उसमें योग दिवस के आसनों को भी जोड़ सकते हैं। इसमें धर्म या जाति का कोई सवाल ही नहीं है। योग दिवस एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन है और यह किसी खास धर्म का हिस्सा नहीं है,” डॉ. शाकिर ने कहा।

उन्होंने आगे कहा, “मुसलमान दिन में पांच बार नमाज पढ़ते हैं, और नमाज अपने आप में एक योग की तरह है। जब हम खुद प्रतिदिन योग कर रहे हैं, तो फिर योग दिवस का विरोध क्यों? यह तो हमारी संस्कृति और सहिष्णुता का प्रतीक है।”

डॉ. शाकिर अली ने यह भी स्पष्ट किया कि पसमांदा मुस्लिम समाज प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़ा है और समाज को आगे बढ़ाने के हर प्रयास में सरकार का सहयोग करेगा। “हम हिंदुस्तान में रहते हैं, और प्रधानमंत्री की बातों को सम्मान देते हैं। हम योग दिवस में भाग लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब को और मजबूत करते हैं। यह हमारे लिए गर्व की बात है,” उन्होंने जोड़ा।

डॉ. अली ने व्यंग्य करते हुए कहा कि “मैं कोई अस्पताल नहीं बता सकता, लेकिन बद्रे आलम को खुद सोचने की जरूरत है।” उन्होंने सवाल किया कि अगर पूरा समाज एकजुट होकर सार्वजनिक स्थानों पर योग करता है, तो इसमें क्या आपत्ति हो सकती है?

उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब योग दिवस पर धार्मिक असहमति के स्वर उभरे हैं, लेकिन पसमांदा समाज की यह मुखर प्रतिक्रिया स्पष्ट करती है कि योग अब एक धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और स्वास्थ्य से जुड़ा राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है।

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