यह नीति केवल शीत युद्ध के दौर की गुटनिरपेक्षता नहीं है, बल्कि उससे आगे बढ़कर बहु-संरेखण (मल्टी-अलाइनमेंट) की एक सक्रिय और विकसित रणनीति है। इसका अर्थ है कि भारत विभिन्न देशों के साथ उनके गुणों और आपसी हितों के आधार पर सहयोग करता है, राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च रखता है और किसी एक गुट में बंधने से बचता है।
रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब है कि भारत अपने महत्वपूर्ण हितों-सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और संप्रभुता-से जुड़े फैसले स्वतंत्र रूप से लेने की क्षमता और इच्छा बनाए रखे। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, जो आज विखंडन और प्रतिस्पर्धा से भरी है, उसमें यह नीति भारत को जोखिमों को संतुलित करने, निर्भरताओं को विविध बनाने और अपनी कूटनीतिक ताकत बढ़ाने का अवसर देती है।
उदाहरण के तौर पर, भारत अमेरिका के साथ क्वाड जैसे मंचों के माध्यम से रक्षा और तकनीकी सहयोग को गहरा कर रहा है, वहीं रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा साझेदारी को भी बनाए हुए है। इसी के साथ, सीमा तनाव के बावजूद चीन के साथ आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने की कोशिश भी जारी है, ताकि कोई एक शक्ति भारत पर अपनी शर्तें थोप न सके।
पश्चिम एशिया में भारत की संतुलित कूटनीति इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। यह क्षेत्र पहले से ही गहरी राजनीतिक ध्रुवीकरण से प्रभावित है, लेकिन भारत ने यहां भी संतुलन बनाए रखा है। इज़रायल के साथ भारत ने अपनी रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है, जिससे रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और नवाचार जैसे क्षेत्रों में ठोस लाभ मिले हैं।
उदाहरण के लिए, बराक-8 जैसे सह-विकसित रक्षा सिस्टम, ड्रिप इरिगेशन तकनीक को बढ़ावा देने के लिए 33 से अधिक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, जल संकट से निपटने के लिए डिसैलिनेशन और रीसाइक्लिंग तकनीक, तथा एआई और साइबर सुरक्षा में संयुक्त अनुसंधान जैसे प्रयास दोनों देशों के सहयोग को मजबूत बनाते हैं।
वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच वस्तु व्यापार लगभग 3.75 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, और फरवरी 2026 में शुरू हुई मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बातचीत से हाई-टेक और एमएसएमई क्षेत्रों में और वृद्धि की संभावना है।
हालांकि, इज़रायल के साथ यह सहयोग भारत की व्यापक क्षेत्रीय नीति से समझौता नहीं करता। भारत संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे अरब देशों के साथ ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी के क्षेत्रों में मजबूत संबंध बनाए हुए है। साथ ही, वह फिलिस्तीन के लिए दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है और मानवीय सहायता भी प्रदान करता है। ईरान जैसे देशों के साथ भी भारत रचनात्मक संवाद बनाए रखता है।
फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इज़रायल यात्रा जैसे हालिया घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि भारत डी-हाइफनेशन की नीति अपनाता है| अर्थात एक देश के साथ संबंध मजबूत करते हुए दूसरे साझेदारों को अलग-थलग नहीं करता और मानवीय मूल्यों से भी पीछे नहीं हटता। यह व्यावहारिक संतुलन क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करता है और वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में भारत की भूमिका को भी सुदृढ़ बनाता है।
आज के ध्रुवीकृत वैश्विक माहौल में रणनीतिक स्वायत्तता भारत के लिए एक सुरक्षा कवच और अवसरों का सेतु दोनों है। यह नीति भारत को ऐसे संप्रभु निर्णय लेने की क्षमता देती है जो सीधे नागरिकों के हितों से जुड़े हों, चाहे वह राष्ट्रीय सुरक्षा हो, खाद्य और जल सुरक्षा हो या नवाचार के जरिए रोजगार सृजन। साथ ही, यह संघर्षों के दौरान मानवीय संवेदनशीलता और बहुपक्षवाद के समर्थन को भी बनाए रखती है।
जैसे-जैसे वैश्विक भू-राजनीतिक दरारें गहरी होती जा रही हैं, भारत की स्वतंत्र और हित-आधारित कूटनीति एक परिपक्व मॉडल के रूप में सामने आती है। यह न तो अलग-थलग रहने की नीति है और न ही किसी के पीछे चलने की, बल्कि एक आत्मविश्वासी, संतुलित और दूरदर्शी भूमिका है, जो बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को इस तरह आकार देने की कोशिश करती है कि विकास, शांति और समानता सभी के लिए सुनिश्चित हो सके।
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