राहुल गांधी संग दिखा जगदीश टाइटलर सोशल मीडिया पर छिड़ा राजनीतिक बवाल !

राहुल गांधी के निकट टाइटलर की मौजूदगी खासकर पंजाब में, जहां 1984 की हिंसा की यादें आज भी ताजा हैं, एक वर्ग के मतदाताओं को नाराज़ कर सकती है।

राहुल गांधी संग दिखा जगदीश टाइटलर सोशल मीडिया पर छिड़ा राजनीतिक बवाल !

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स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित एक बारिश से भीगे समारोह की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। तस्वीर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी अग्रभूमि में नजर आ रहे हैं, जबकि पृष्ठभूमि में जगदीश टाइटलर को लाल घेरे में दिखाया गया है। इस फोटो को भाजपा नेता अमित मालवीय ने अपने X पोस्ट में साझा करते हुए लिखा, “कुछ दाग कभी नहीं धुलते, चाहे कितना भी समय बीत जाए।”

मालवीय ने आरोप लगाया कि टाइटलर “राजीव गांधी के कहने पर सिखों के खिलाफ नरसंहार करने वाला व्यक्ति” था और कांग्रेस नेतृत्व पर 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए बिना पछतावे का रवैया अपनाने का आरोप लगाया।

जगदीश टाइटलर, एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता, पर लंबे समय से आरोप है कि 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ हुई हिंसा में उनकी भूमिका रही थी। पीड़ितों और मानवाधिकार समूहों के इन आरोपों को टाइटलर लगातार नकारते रहे हैं, लेकिन यह विवाद उनकी राजनीतिक छवि पर हमेशा छाया रहा है। ऐसे में राहुल गांधी के साथ उनकी मौजूदगी को राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है।

कांग्रेस की ओर से इस विवाद पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, हालांकि पार्टी सूत्रों का कहना है कि टाइटलर की सार्वजनिक कार्यक्रमों में मौजूदगी असामान्य नहीं है और इसे आरोपों की स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। दूसरी ओर, भाजपा नेताओं ने इस मौके का इस्तेमाल कांग्रेस की नैतिक स्थिति और 1984 के दंगा पीड़ितों के लिए न्याय के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने के लिए किया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद उस समय सामने आया है जब कांग्रेस आगामी चुनावों से पहले एकता और समावेशिता का संदेश देने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि राहुल गांधी के निकट टाइटलर की मौजूदगी खासकर पंजाब में, जहां 1984 की हिंसा की यादें आज भी ताजा हैं, एक वर्ग के मतदाताओं को नाराज़ कर सकती है।

यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि भारत की राजनीति में ऐतिहासिक घाव आज भी गहरे हैं और समय-समय पर चुनावी बहस का केंद्र बन जाते हैं।

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