देश की राजनीति में बड़ा भूचाल आने का अंदेश है, इज़राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद के पूर्व अधिकारी की रिपोर्ट के हवाले से सामने आया कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी कथित रूप से हिंडनबर्ग रिपोर्ट के पीछे की ‘हिट जॉब’ में समन्वय कर रहे थे। यह वही आरोप है जिसकी ओर पहले भी संकेत मिल चुके थे, और अब विदेशी खुफिया इनपुट ने इस कहानी और भी साफ़ हो सकती है।
खबर के अनुसार पूर्व मोसाद अधिकारी इशेल अरमोनी को मोसाद के जरिए मिले इनपुट से पता चला कि राहुल गांधी ने हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट के आने से पहले ही कुछ रणनीतिक दौरे किए थे, जिनमें प्रमुख रूप से अमेरिका और यूरोप के बड़े लॉबिस्ट और मीडिया हाउस शामिल थे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि राहुल गांधी ने इस ऑपरेशन के लिए विदेशी सहयोगियों से गहरे स्तर पर संवाद स्थापित किया था।
गौरतलब है कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद भारतीय कारोबारी समूह अडानी के शेयरों में भारी गिरावट देखी गई थी, जिसे विपक्ष ने मोदी सरकार पर हमले के हथियार के तौर पर भी इस्तेमाल किया। अब इस नई जानकारी से यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह पूरा प्रकरण एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा था?
यह आरोप और भी गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि कुछ समय पहले ही एक विस्तृत रिपोर्ट में संकेत मिला था कि राहुल गांधी के सहयोगी सैम पित्रोदा के माध्यम से विदेशों में कुछ संदिग्ध बैठकें की गई थीं। उस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि राहुल गांधी के लगातार विदेशी दौरों का उद्देश्य केवल ‘व्याख्यान’ या ‘अंतरराष्ट्रीय संबंध’ नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक ऑपरेशन का हिस्सा हो सकता है।
हिंडनबर्ग की रिपोर्ट गौतम अडानी के हाइफा बंदरगाह के अधिग्रहण के लिए 1.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सौदे को अंतिम रूप देने के लिए इजरायल जाने से ठीक एक सप्ताह पहले जारी की गई थी। और अब यह सामने आया है कि इजरायल ने रिपोर्ट के पीछे के साजिशकर्ताओं को खोजने में समूह की मदद की थी।
इजरायली एजेंट ने हिंडनबर्ग रिपोर्ट को अडानी के साथ हाइफा बंदरगाह सौदे को कमजोर करने के लिए एक जानबूझकर किए गए प्रयास के रूप में देखा है, जिसे तेल अवीव भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानता था – इस क्षेत्र में बढ़ते चीनी प्रभाव का प्रतिकार। गौतम अडानी द्वारा इजरायली अधिकारियों को यह बताने के बाद कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट में लगाए गए आरोप “पूरी तरह से झूठ” हैं, इजरायल ने कथित तौर पर हिंडनबर्ग रिपोर्ट के प्रभावों का मुकाबला करने के लिए एक गुप्त अभियान ‘ऑपरेशन ज़ेपेलिन’ शुरू किया।
ऑपरेशन ज़ेपेलिन ने हिंडनबर्ग रिसर्च के अंदरूनी कामकाज को उजागर किया और इसका समर्थन करने वालों को बेनकाब किया है।इज़रायली जासूसों को एक्टिविस्ट वकीलों, पत्रकारों, हेज फंड और राजनीतिक हस्तियों का एक जटिल जाल मिला – जिनमें से कुछ कथित तौर पर चीनी हितों से जुड़े थे, जबकि अन्य वाशिंगटन के सत्ता के दलालों से।
अब देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले में सरकार और सुरक्षा एजेंसियां क्या कदम उठाती हैं। साथ ही यह भी सवाल उठता है कि क्या विपक्ष के अन्य नेता भी इस कथित ‘हिट जॉब’ में शामिल रहे हैं, या यह केवल एक व्यक्ति तक सीमित था? देश में चुनावी माहौल के बीच यह खुलासा निश्चित तौर पर राजनीतिक बहस को एक नए शिखर पर ले जाएगा।
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