शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने महाराष्ट्र में स्कूलों में हिंदी भाषा को अनिवार्य बनाए जाने के कथित निर्णय का जोरदार विरोध करते हुए रविवार को शिक्षा विभाग के सरकारी आदेश (GR) की प्रति जलाकर प्रदर्शन किया। पार्टी नेताओं ने इसे ‘हिंदी थोपने’ की कोशिश बताया और कहा कि यह महाराष्ट्र की अस्मिता के खिलाफ है।
पार्टी नेता और पूर्व मंत्री आदित्य ठाकरे ने इस प्रदर्शन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा, “हिंदी की जबरन थोपने की कोशिश महाराष्ट्र में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह केवल राजनीति नहीं, बल्कि बच्चों पर बेवजह का बोझ डालने वाली मूर्खता है।”
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा पहली कक्षा के छात्रों के लिए तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को अनिवार्य बनाना अनुचित है। “हमने आज उस जीआर को जलाया जिसमें महाराष्ट्र के स्कूलों में पहली कक्षा से तीन भाषाएं अनिवार्य की गई हैं। किसी भी नई भाषा या विषय को पांचवीं कक्षा के बाद ही वैकल्पिक तौर पर शुरू किया जाना चाहिए,” ठाकरे ने कहा।
शिवसेना (उद्धव गुट) का आरोप है कि यह फैसला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुवाई वाली “एंटी-महाराष्ट्र” सरकार का हिस्सा है जो स्थानीय भाषाओं और संस्कृति को दरकिनार कर हिंदी को थोप रही है।
इससे पहले रविवार (29 जून) को शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने मीडिया से कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इस ‘हिंदी थोपने’ के विरोध में अपने चचेरे भाई और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे के साथ खड़े हैं। हालांकि, विरोध प्रदर्शन में राज ठाकरे की अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी।
विरोध प्रदर्शन का मकसद यह संदेश देना था कि महाराष्ट्र की मातृभाषा मराठी को दरकिनार कर किसी अन्य भाषा को थोपना यहां स्वीकार नहीं किया जाएगा। पार्टी ने यह भी चेतावनी दी कि अगर सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया तो राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। शिवसेना (यूबीटी) का यह विरोध ऐसे समय में हुआ है जब भाषा और शिक्षा को लेकर राज्य में पहले से ही सियासी गर्मी बनी हुई है।
हालांकि प्रदेश की महायुती सरकार ने इस बात को कईबार स्पष्ट किया है की हिंदी भाषा को थोंपा नहीं जा रहा है, बल्की नैशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 के तहत वैकल्पिक भाषा में स्थान दिया जा रहा है। साथ ही प्रदेश में तीन भाषाओं में मराठी भाषा को अनिवार्य किया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है की पिछले साल के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद ठाकरे गुट की शिवसेना का राजनीतिक धरातल न केवल कमज़ोर हुआ है, बल्की बड़ी संख्या में हिंदू वोटर दूर हुआ है। वहीं राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे इन विरोध आंदोलनों को उग्र कर मराठी मतदाताओं को आने वाली पालिका चुनावों में एकजुट करने के प्रयास में है।
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