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Wednesday, October 21, 2026
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महाराष्ट्र के फंसे पर्यटकों ने वांगचुक और उनके समर्थकों की रिहाई की मांग की!

वांगचुक ने मांग की है कि लद्दाख को भी संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए। इसी मांग को लेकर उन्होंने लेह से दिल्ली तक पैदल मार्च निकाला था| वांगचुक और उनके समर्थकों की हिरासत से लेह में वाग्चुक के समर्थक नाराज हैं।

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पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक और उनके समर्थकों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया है|इन सभी को सिंघु बॉर्डर पर हिरासत में लिया गया| वाग्चुक और उनके समर्थकों ने मार्च निकाला था और राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने जा रहे थे| वांगचुक ने मांग की है कि लद्दाख को भी संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए। इसी मांग को लेकर उन्होंने लेह से दिल्ली तक पैदल मार्च निकाला था| वांगचुक और उनके समर्थकों की हिरासत से लेह में वाग्चुक के समर्थक नाराज हैं।

लेह के लोगों ने यह रुख अपना लिया है कि किसी को भी लेह छोड़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी|इसके चलते लेह आने वाले कई पर्यटक फंसे हुए हैं। इनमें महाराष्ट्र के पर्यटक भी शामिल हैं। लेह में फंसे लोगों में से महाराष्ट्र के कुछ पर्यटकों ने वांगचुक और उनके समर्थकों की रिहाई की मांग की है। इन यात्रियों ने कहा कि हम यहां फंस गए हैं और कई लोगों की वापसी की उड़ान छूट गई है|पर्यटकों का परिवार उनका इंतजार कर रहा है|कुछ के माता-पिता बुजुर्ग हैं और उनके लिए जल्दी घर लौटना महत्वपूर्ण है।

वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था|वांगचुक ने लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर एक मार्च का नेतृत्व किया। छठी अनुसूची के तहत असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के लिए स्वायत्त जिला परिषदों की स्थापना की गई है।इस सम्मेलन का उद्देश्य आदिवासी संस्कृति को संरक्षित करना है|

जमीन से रिश्ता यहां के स्थानीय लोगों के लिए पहचान का विषय है। यदि स्थानीय लोगों का भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण हो तो वे अपनी संस्कृति को संरक्षित कर सकते हैं। स्थानीय लोगों की जीवनशैली और संस्कृति को संरक्षित करने के लिए यह कदम महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासियों के अधिकारों और संस्कृति को संरक्षित करने के लिए प्रशासन को स्वायत्तता प्रदान करती है।

यह स्वायत्तता स्वायत्त जिला परिषद द्वारा प्रदान की जाती है। इस परिषद को आदिवासियों की भूमि, वन, कृषि, रीति-रिवाजों और परंपराओं से संबंधित कानून बनाने का भी अधिकार है। संक्षेप में, यह परिषद एक राज्य के प्रशासन की तरह कार्य करती है।

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