कॉर्पोरेट लेंस – प्रशांत कारुळकर
पश्चिम बंगाल में भाजपा को मिली जीत रणनीति की जीत है। निर्विवाद रूप से भाजपा नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस रणनीति के शिल्पकार हैं, जिन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया। जहां जीत की संभावना 5 प्रतिशत भी नहीं थी, वहां उन्होंने भाजपा की सीटें 200 के पार पहुंचा दीं। एक उद्यमी के रूप में उनकी रणनीति मुझे बेहद प्रभावित करती है।
चुनाव हो या न हो, किसी भी रणनीति का आधार गणित और आंकड़े होते हैं। अमित शाह इस गणित में माहिर हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके पास उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी थी, जहां उन्होंने 80 में से 71 (सहयोगियों के साथ 73) सीटें जीतकर रिकॉर्ड बनाया। उन्होंने विरोधियों को हैरान कर दिया और यह कारनामा कई बार दोहराया।
पश्चिम बंगाल में पिछले दस वर्षों में उन्होंने भाजपा को शून्य से एक बड़ी ताकत बनाने के लिए जो मेहनत की, उसका असर 2026 विधानसभा चुनाव के नतीजों में साफ दिखता है। जो लोग राजनीति में सफल होना चाहते हैं, उन्हें इस रणनीति का अध्ययन जरूर करना चाहिए।
पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा को मिले भारी वोट प्रतिशत इस रणनीति की सबसे बड़ी सफलता है। 2016 में भाजपा का वोट शेयर सिर्फ 10.16% था, जो 2021 में बढ़कर 38.1% हो गया। 2026 में यह आंकड़ा लगभग 45.84% तक पहुंच गया।
अमित शाह को यह समझ है कि मुस्लिम मतदाता भाजपा को वोट नहीं देते, इसलिए वे वहीं फोकस करते हैं जहां जीत की संभावना अधिक हो। उन्होंने पश्चिम बंगाल में 205 हिंदू बहुल सीटों पर ध्यान केंद्रित किया, बजाय सभी 294 सीटों पर ताकत लगाने के। जहां मुस्लिम मतदाता अधिक थे, वहां वोट विभाजन की रणनीति अपनाई गई।
यह भी संभव है कि उन्होंने कांग्रेस और वाम दलों को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत होने दिया, ताकि वे तृणमूल कांग्रेस के वोट काट सकें| हालांकि यह केवल एक अनुमान है। दक्षिण बंगाल के नदिया, उत्तर 24 परगना और मेदिनीपुर जैसे इलाकों में भाजपा ने मजबूत प्रदर्शन किया।
2021 और उसके बाद ‘इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF)’ जैसे दलों के कारण कुछ सीटों पर मुस्लिम वोट बंटे, जिससे भाजपा को फायदा हुआ। यह पैटर्न मुर्शिदाबाद, मालदा और दिनाजपुर में भी देखा गया।
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू करने के वादे से मतुआ समाज वाली 40–50 सीटों पर भाजपा ने पकड़ मजबूत की। ‘मेरा बूथ, सबसे मजबूत’ अभियान के तहत 80 हजार से ज्यादा बूथों तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क बनाया गया। साथ ही, पार्टी ने बाहरी नेताओं के बजाय अपने पुराने और वफादार कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी।
अमित शाह ने महिलाओं की सुरक्षा, युवाओं को रोजगार और सबके लिए विकास को मुद्दा बनाया। बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा भी उन्होंने बिना ज्यादा शोर किए लोगों तक पहुंचाया।
ममता बनर्जी ने बंगाली अस्मिता के मुद्दे को उठाकर भाजपा को रोकने की कोशिश की, लेकिन शुभेंदु अधिकारी और दिलीप घोष जैसे नेताओं के कारण यह रणनीति पूरी तरह सफल नहीं हो पाई। यह जीत केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि देश की दिशा बदलने वाली और इतिहास रचने वाली मानी जा रही है।
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